TatwaBodhani ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते | पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवा वशिष्यते || ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते | पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवा वशिष्यते ||

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ईश्वर का अर्थ लोग परमात्मा से भी लगाते हैं और भगवान से भी । मेरे कहने का अर्थ है कि ईश्वर में वे सभी आ जाते हैं जिन्हें हम पूजते हैं या महत्वपूर्ण मानते हैं जो हमारी जिंदगी को किसी न किसी रूप से प्रभावित करते हैं । ठीक वैसे ही जैसे डॉक्टर शब्द कहने से पुरुष, स्त्री, सहायक सभी प्रकार के चिकित्सक आ जाते हैं, phd की उपाधि वाले भी आ जाते हैं।
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हिन्दू धर्म के आदि शंकराचार्य जी कहते हैं कि भगवान विष्णु क्षीरसागर में वास करते हैं तो ये क्षीर सागर है कहाँ? जबकि पृथ्वी पर सात महासागर ही हैं लेकिन इसमें से क्षीरसागर तो कोई नहीं है। पहले ये समझना जरूरी है कि क्षीरसागर का अर्थ क्या है? तो क्षीरसागर का अर्थ होता है दूध का समुद्र, क्षीर= दूध, सागर= समुद्र ।
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प्रिये पाठक हिन्दू धर्म के वेद और शास्त्र बहुतो अजीब और अलौकिक रहस्यों से भड़ा है, ये विज्ञान का वो समूह है जिसपर लोग आसानी से विश्वास नहीं करते, विश्वास ना करने का कारण है हम अपने आप को पूर्ण समझते हैं, हम कभी भी अपने ज्ञान और अपने क्षमता से ऊपर या बाहर नहीं देखते, हम जितना जानते हैं उसे ही ज्ञान और दुनिया समझते हैं, हमारे अंदर ये भावना होती है कि जितना मुझे ज्ञान है वही पूर्ण है और इससे हटके कुछ नहीं है,
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अब मैं आप सभी को परमात्मा के विषय मे बताना चाहता हूँ । इस दूधिया प्रकाश में निरंतर क्रिया होती है और उस क्रिया के परिणाम तीन गुणों के रूप में मिलते हैं जिसे सत्व गुण= ब्रह्मा, रज गुण = विष्णु और तमो गुण = शिव कहते हैं । ये तीनों गुण इस सृष्टि को संचालित करते हैं। इसी में इन तीनों के अलावा शक्ति और बुराई की भी उत्पत्ति होती है ।
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आपने कई बार सुना होगा कि पंडित जी मंत्रों का जप करके ये किया या वो किया, साथ ही नेट पे या tv पर भी बताया जाता है कि महामृत्युंजय के जप से दुख दूर होते हैं, गायत्री के जप से तेज आता है, श्राप कटता है, लेकिन कैसे? अगर बोलने से ही काम हो जाता तो आज कोई दुखी ही नहीं होता, ना जाने हम कितनो को अच्छा बोलते हैं कितनों को बुरा बोलते हैं वो सब हो जाता, लेकिन ऐसा नहीं होता तो मंत्रो से कैसे होता है? आज कल मंत्रों के जप करने पर भी काम नहीं होता क्यों? इस बात पे ध्यान देने की जरूरत है, जबकि पहले के समय मे यही मंत्र काम करते थे, इन्ही सब कारणों से आज के लोग पंडित, पूजा, मंत्र आदी पे कम विश्वास करने लगे हैं ।
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आइये आज हम अतृप्त आत्मा के विषय में बात करते हैं। अतृप्त आत्मा क्या है? और क्यों भटकती रहती है? और हमेशा ही अतृप्त क्यों रहती है?, उसे तृप्ति क्यों नहीं मिलती । आज हम आपको इसका कारण बताएँगे और इसका अनुभव भी कराएंगे की क्या किसीको पानी पीने के बाद भी प्यास लगी रह सकती है । श्रीमद्भागवत गीता में भगवान् कहते हैं की जब इंसान की मृत्यु होती है उस समय उसके अंदर यानि मन में जैसा भाव रहता है वैसा ही गति प्राप्त होता है । इस बात को हम अपने पिछले ब्लॉग मुक्ति क्या है में नहीं बताया लेकिन इसरा जरूर कर दिया था कि आत्मा तीन घेरे के अंदर बन्द रहता है, चेतना, मन और बुद्धि।, और इन तीनों के टूटने के बाद ही मुक्ति मिलती है। इस ब्लॉग में कुछ इसी तरह की बातें समझाने की कोशिश की गई है।
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दोस्तों आज मै आपलोगों को ब्रह्मचर्य के विषय मे बताना चाहता हूँ।
ब्रह्मचर्य होता क्या है? ब्रह्म का अनुसरण करना ब्रह्मचर्य कहलाता है
और इसको जो करता है वो ब्रह्मचारी है ।
हमारे यहाँ ब्रह्मचारी शब्द सुनते ही लोगों के मन मे एक ऐसे व्यक्ति का खयाल आता है जो पूर्ण रूप से कुँआरा हो।
जो सन्यासियों की तरह अपना जीवन यापन करता हो।
सही है ये भी लेकिन इन सबसे पहले ये जानते हैं कि ब्रह्म क्या है?
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श्रिष्टी अर्थात ब्रह्मांड+जीव+तत्व+वस्तुयें। जैसा कि मैंने अपने पिछले ब्लॉगों में कहा है कि ब्रह्म के एक कोने में हमारा ब्रह्मांड मटर के दाने के समान है उसके अनुसार इस पूरे ब्रह्म में असंख्य ब्रह्मांड है, ओर इस बात को नही जानने वाले आपस मे लड़ते हैं कि इस ग्रंथ में ये लिखा है तो उस ग्रंथ में ये लिखा है। हमारे हिन्दू धर्म के ग्रंथ में उल्लेख मिलता है कि लोमस ऋषि के शरीर पर जितने रोम(शरीर पर उगने वाले बाल) है उतने ब्रह्मांड हैं और अगर एक ब्रह्मांड का अंत होता है तो उनके शरीर से एक रोम गिर जाता है।
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आपने कई बार सुना होगा कि पंडित जी मंत्रों का जप करके ये किया या वो किया, साथ ही नेट पे या TV पर भी बताया जाता है कि महामृत्युंजय के जप से दुख दूर होते हैं, गायत्री के जप से तेज आता है श्राप कटता है लेकिन कैसे? अगर बोलने से ही काम हो जाता तो आज कोई दुखी ही नहीं होता, ना जाने हम कितनो को अच्छा बोलते हैं कितनों को बुरा बोलते हैं वो सब हो जाता, लेकिन ऐसा नहीं होता तो मंत्रो से कैसे होता है? आज कल मंत्रों के जप करने पर भी काम नहीं होता क्यों? इस बात पर ध्यान देने की जरूरत है, जबकि पहले के समय मे यही मंत्र काम करते थे, इन्ही सब कारणों से आज के लोग पंडित, पूजा, मंत्र आदी पर कम विश्वास करने लगे हैं ।
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हमारी पृथ्वी विविधताओं से भरी है ये अपने अंदर अनेक रहस्य लिए है, इसे समझने के लिए हमारी ज़िंदगी बहुत छोटी है और परिवर्तन जो प्रकृति का नियम है, सारे तथ्य को मिटा देता है और हम गुमराह हो जाते हैं हमारे धर्म ग्रंथों में कहा गया है कि एक युग का चिन्ह दूसरे युग आने से पहले मिट जाता है, हम धार्मिक ग्रंथों में कही जाने वाली बातों को हम धर्म का आदर करते हुए स्वीकार कर लेते है । मानव इतिहास लाखों नहीं करोड़ों वर्ष पुरानी है जो हमारा पुराण कहता है, लेकिन आधुनिक इतिहास पढ़
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उपनिषदों में कहा गयाहै कि सर्वप्रथम क्रिया हुई । अब सोचने की बात यह है कि क्रिया हुई तो कैसे और कहाँ क्योंकि रिक्त (शून्य ) स्थान में क्रिया हो नहीं सकती क्रिया होने केलिए कोई पदार्थ (तत्व ) चाहिए वह कौन सा तत्व है जिसमे क्रिया हुई ? हमें तत्व के माध्यम से भगवान और देवताओं को समझने के लिए भक्ति की चादर हटा कर देखना होगा क्योंकि ज्ञान में भक्ति है पर भक्ति में ज्ञान नहीं है।
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कर्म का सिद्धांत ही इस संसार में प्रबल है और ये इतना उलझा हुआ है कि इससे निकल पाना सबके बस की बात नहीं है। आप बहुत सारे प्रवचन सुने होंगे या बहुत सारे धार्मिक पुस्तकें पढ़ी होगी सब में दो ही बात पर जोर दिया जाता है, पहला कर्म के बंधन से निकलने पर और दूसरा माया मोह त्यागने पर। आज हम आपको बताएंगे कि कर्म के बंधन से कैसे बचेंगे और माया मोह से किस
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आज हम समाधि के विषय में बात करेंगे, सतयुग तथा त्रेता युग के लोग दस-दस हजार वर्ष तप करते थे, क्या कोई दस हजार वर्ष तक एक ही जगह बैठा रह सकता है? बिना खाये पिए ऐसा कैसे सम्भव है?, तप तथा समाधि में क्या अंतर है? इसी सब बातों की चर्चा इस ब्लॉग में करेंगे । तपस्या तप तथा समाधि में अंतर - पहले तपस्या की बात करते हैं, तपस्या सकाम(कामना युक्त) होता है जो अविद्या (विद्या हीन) से उतपन्न होता है, इसे अकर्म (जो कर्म नहीं है ) कहा गया है और तप तथा समाधि निष्काम(बिना किसी कामना के) होता है ओर जो विद्या से उतपन्न होता है और उसे कर्म कहा गया है ।
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तत्त्व बोधिनी का अर्थ तत्व को जानना है, और तत्व को तभी जाना जा सकता है जब हमारे पास प्रज्ञा चक्षु हो अर्थात प्रज्ञा = ज्ञान, चक्षु= नेत्र, आंख, अतः हमारा उद्देश्य लोगो के मन से अविश्वास, शक, इत्यादि हटा के उनको उनके कर्म और धर्म के प्रति जगाना है। आज के समय में ऐसे लोगों की संख्या काफी हो गई है जो रिवाजो को ढकोसला या अंध विश्वास मानते हैं, प्रज्ञा चक्षु ऐसे विचारों का समर्थन करता है लेकिन सभी बातों में नहीं । जैसे मेरा एक मित्र है जो मंदिर के अन्दर नहीं जाता कभी, हम जायेंगे तो वो हमारा इंतजार बाहर में करता है, उसका कहना है कि माँ बाप ही भगवान है बांकी कोई भगवान नहीं होता, मैं उसका समर्थन करता हूँ, मैन उसको एक दिन कहा कि भाई तेरे नास्तिकता में भी आस्तिकता है वो ऐसे कि तुम भगवान (ईश्वर) के अस्तित्व को अपने माँ और पापा में देखते हो। वैसे भी धरती पे माँ, बाप और गुरु ही ईश्वर के तीन गुण हैं जैसे माँ जन्म देकर सृजन करती है यानी वो ब्रह्मा है, पिता हमारा पालन पोषण करता है जो विष्णु है और गुरु हमें ज्ञान देता है और हमारे अज्ञानता का नाश करता है जो शिव है। शिव को वैसे जगतगुरू भी कहा जाता है।
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तत्त्व बोधिनी का अर्थ तत्व को जानना है, और तत्व को तभी जाना जा सकता है जब हमारे पास प्रज्ञा चक्षु हो अर्थात प्रज्ञा = ज्ञान, चक्षु= नेत्र, आंख, अतः हमारा उद्देश्य लोगो के मन से अविश्वास, शक, इत्यादि हटा के उनको उनके कर्म और धर्म के प्रति जगाना है। आज के समय में ऐसे लोगों की संख्या काफी हो गई है जो रिवाजो को ढकोसला या अंध विश्वास मानते हैं, प्रज्ञा चक्षु ऐसे विचारों का समर्थन करता है लेकिन सभी बातों में नहीं । जैसे मेरा एक मित्र है जो मंदिर के अन्दर नहीं जाता कभी, हम जायेंगे तो वो हमारा इंतजार बाहर में करता है, उसका कहना है कि माँ बाप ही भगवान है बांकी कोई भगवान नहीं होता, मैं उसका समर्थन करता हूँ, मैन उसको एक दिन कहा कि भाई तेरे नास्तिकता में भी आस्तिकता है वो ऐसे कि तुम भगवान (ईश्वर) के अस्तित्व को अपने माँ और पापा में देखते हो। वैसे भी धरती पे माँ, बाप और गुरु ही ईश्वर के तीन गुण हैं जैसे माँ जन्म देकर सृजन करती है यानी वो ब्रह्मा है, पिता हमारा पालन पोषण करता है जो विष्णु है और गुरु हमें ज्ञान देता है और हमारे अज्ञानता का नाश करता है जो शिव है। शिव को वैसे जगतगुरू भी कहा जाता है।
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तत्त्व बोधिनी का अर्थ तत्व को जानना है, और तत्व को तभी जाना जा सकता है जब हमारे पास प्रज्ञा चक्षु हो अर्थात प्रज्ञा = ज्ञान, चक्षु= नेत्र, आंख, अतः हमारा उद्देश्य लोगो के मन से अविश्वास, शक, इत्यादि हटा के उनको उनके कर्म और धर्म के प्रति जगाना है। आज के समय में ऐसे लोगों की संख्या काफी हो गई है जो रिवाजो को ढकोसला या अंध विश्वास मानते हैं, प्रज्ञा चक्षु ऐसे विचारों का समर्थन करता है लेकिन सभी बातों में नहीं । जैसे मेरा एक मित्र है जो मंदिर के अन्दर नहीं जाता कभी, हम जायेंगे तो वो हमारा इंतजार बाहर में करता है, उसका कहना है कि माँ बाप ही भगवान है बांकी कोई भगवान नहीं होता, मैं उसका समर्थन करता हूँ, मैन उसको एक दिन कहा कि भाई तेरे नास्तिकता में भी आस्तिकता है वो ऐसे कि तुम भगवान (ईश्वर) के अस्तित्व को अपने माँ और पापा में देखते हो। वैसे भी धरती पे माँ, बाप और गुरु ही ईश्वर के तीन गुण हैं जैसे माँ जन्म देकर सृजन करती है यानी वो ब्रह्मा है, पिता हमारा पालन पोषण करता है जो विष्णु है और गुरु हमें ज्ञान देता है और हमारे अज्ञानता का नाश करता है जो शिव है। शिव को वैसे जगतगुरू भी कहा जाता है।
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तत्त्व बोधिनी का अर्थ तत्व को जानना है, और तत्व को तभी जाना जा सकता है जब हमारे पास प्रज्ञा चक्षु हो अर्थात प्रज्ञा = ज्ञान, चक्षु= नेत्र, आंख, अतः हमारा उद्देश्य लोगो के मन से अविश्वास, शक, इत्यादि हटा के उनको उनके कर्म और धर्म के प्रति जगाना है। आज के समय में ऐसे लोगों की संख्या काफी हो गई है जो रिवाजो को ढकोसला या अंध विश्वास मानते हैं, प्रज्ञा चक्षु ऐसे विचारों का समर्थन करता है लेकिन सभी बातों में नहीं । जैसे मेरा एक मित्र है जो मंदिर के अन्दर नहीं जाता कभी, हम जायेंगे तो वो हमारा इंतजार बाहर में करता है, उसका कहना है कि माँ बाप ही भगवान है बांकी कोई भगवान नहीं होता, मैं उसका समर्थन करता हूँ, मैन उसको एक दिन कहा कि भाई तेरे नास्तिकता में भी आस्तिकता है वो ऐसे कि तुम भगवान (ईश्वर) के अस्तित्व को अपने माँ और पापा में देखते हो। वैसे भी धरती पे माँ, बाप और गुरु ही ईश्वर के तीन गुण हैं जैसे माँ जन्म देकर सृजन करती है यानी वो ब्रह्मा है, पिता हमारा पालन पोषण करता है जो विष्णु है और गुरु हमें ज्ञान देता है और हमारे अज्ञानता का नाश करता है जो शिव है। शिव को वैसे जगतगुरू भी कहा जाता है।
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तत्त्व बोधिनी का अर्थ तत्व को जानना है, और तत्व को तभी जाना जा सकता है जब हमारे पास प्रज्ञा चक्षु हो अर्थात प्रज्ञा = ज्ञान, चक्षु= नेत्र, आंख, अतः हमारा उद्देश्य लोगो के मन से अविश्वास, शक, इत्यादि हटा के उनको उनके कर्म और धर्म के प्रति जगाना है। आज के समय में ऐसे लोगों की संख्या काफी हो गई है जो रिवाजो को ढकोसला या अंध विश्वास मानते हैं, प्रज्ञा चक्षु ऐसे विचारों का समर्थन करता है लेकिन सभी बातों में नहीं । जैसे मेरा एक मित्र है जो मंदिर के अन्दर नहीं जाता कभी, हम जायेंगे तो वो हमारा इंतजार बाहर में करता है, उसका कहना है कि माँ बाप ही भगवान है बांकी कोई भगवान नहीं होता, मैं उसका समर्थन करता हूँ, मैन उसको एक दिन कहा कि भाई तेरे नास्तिकता में भी आस्तिकता है वो ऐसे कि तुम भगवान (ईश्वर) के अस्तित्व को अपने माँ और पापा में देखते हो। वैसे भी धरती पे माँ, बाप और गुरु ही ईश्वर के तीन गुण हैं जैसे माँ जन्म देकर सृजन करती है यानी वो ब्रह्मा है, पिता हमारा पालन पोषण करता है जो विष्णु है और गुरु हमें ज्ञान देता है और हमारे अज्ञानता का नाश करता है जो शिव है। शिव को वैसे जगतगुरू भी कहा जाता है।
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तत्त्व बोधिनी का अर्थ तत्व को जानना है, और तत्व को तभी जाना जा सकता है जब हमारे पास प्रज्ञा चक्षु हो अर्थात प्रज्ञा = ज्ञान, चक्षु= नेत्र, आंख, अतः हमारा उद्देश्य लोगो के मन से अविश्वास, शक, इत्यादि हटा के उनको उनके कर्म और धर्म के प्रति जगाना है। आज के समय में ऐसे लोगों की संख्या काफी हो गई है जो रिवाजो को ढकोसला या अंध विश्वास मानते हैं, प्रज्ञा चक्षु ऐसे विचारों का समर्थन करता है लेकिन सभी बातों में नहीं । जैसे मेरा एक मित्र है जो मंदिर के अन्दर नहीं जाता कभी, हम जायेंगे तो वो हमारा इंतजार बाहर में करता है, उसका कहना है कि माँ बाप ही भगवान है बांकी कोई भगवान नहीं होता, मैं उसका समर्थन करता हूँ, मैन उसको एक दिन कहा कि भाई तेरे नास्तिकता में भी आस्तिकता है वो ऐसे कि तुम भगवान (ईश्वर) के अस्तित्व को अपने माँ और पापा में देखते हो। वैसे भी धरती पे माँ, बाप और गुरु ही ईश्वर के तीन गुण हैं जैसे माँ जन्म देकर सृजन करती है यानी वो ब्रह्मा है, पिता हमारा पालन पोषण करता है जो विष्णु है और गुरु हमें ज्ञान देता है और हमारे अज्ञानता का नाश करता है जो शिव है। शिव को वैसे जगतगुरू भी कहा जाता है।
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तत्त्व बोधिनी का अर्थ तत्व को जानना है, और तत्व को तभी जाना जा सकता है जब हमारे पास प्रज्ञा चक्षु हो अर्थात प्रज्ञा = ज्ञान, चक्षु= नेत्र, आंख, अतः हमारा उद्देश्य लोगो के मन से अविश्वास, शक, इत्यादि हटा के उनको उनके कर्म और धर्म के प्रति जगाना है। आज के समय में ऐसे लोगों की संख्या काफी हो गई है जो रिवाजो को ढकोसला या अंध विश्वास मानते हैं, प्रज्ञा चक्षु ऐसे विचारों का समर्थन करता है लेकिन सभी बातों में नहीं । जैसे मेरा एक मित्र है जो मंदिर के अन्दर नहीं जाता कभी, हम जायेंगे तो वो हमारा इंतजार बाहर में करता है, उसका कहना है कि माँ बाप ही भगवान है बांकी कोई भगवान नहीं होता, मैं उसका समर्थन करता हूँ, मैन उसको एक दिन कहा कि भाई तेरे नास्तिकता में भी आस्तिकता है वो ऐसे कि तुम भगवान (ईश्वर) के अस्तित्व को अपने माँ और पापा में देखते हो। वैसे भी धरती पे माँ, बाप और गुरु ही ईश्वर के तीन गुण हैं जैसे माँ जन्म देकर सृजन करती है यानी वो ब्रह्मा है, पिता हमारा पालन पोषण करता है जो विष्णु है और गुरु हमें ज्ञान देता है और हमारे अज्ञानता का नाश करता है जो शिव है। शिव को वैसे जगतगुरू भी कहा जाता है।
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