TatwaBodhani ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते | पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवा वशिष्यते ||

Dharam Karam

प्रज्ञाचक्षु तत्वबोधिनी के माध्यम से आप सभी के मन को शांति और ज्ञान की कुछ झलक समझाने की कोशिश कर रहा है। हम अपने इस ब्लॉग के धर्म कर्म खण्ड के माध्यम से बताएंगे कि कैसे पूजा, पाठ, धर्म, कर्म का प्रभाव मनुष्य के जिंदगी पर पड़ता है।

पूजा तीन तरह की होती है एक जो ईश्वर की होती है उसे धर्म कर्म या ब्रह्म कर्म कहते हैं, दूसरा वह जो अपने पूर्वजों की होती है उसे पितृ कर्म कहते हैं, तीसरा जो भूत- प्रेत की होती है उसे भूत कर्म या प्रेत कर्म कहते हैं। तीनों कर्मों में ब्रह्म कर्म श्रेष्ठ

होता है, पितृ कर्म उत्तम होता है तथा भुत कर्म मध्यम होता है। तीनों ही कर्म करने का अलग-अलग व्यवस्था है तथा कौन सा कर्म किस प्रकार किया जाना चाहिए उसकी अलग नियम हैं। ब्रह्म कर्म किस प्रकार करने से हमें किस प्रकार का लाभ मिलता है तथा किस प्रकार से किस प्रकार की हानि होती है, इसी प्रकार पितृ कर्म तथा प्रेत कर्म किस प्रकार करने से हमें लाभ तथा हानि प्राप्त हो सकती है और हमारा कर्म निष्फल हो सकता है। ब्रह्म संबंधित कर्म करने के दो प्रमुख रास्ते हैं एक सांख्य योग दूसरा हठ योग, हम आपको प्रज्ञाचक्षु के धर्म-कर्म के माध्यम से यह बताने का प्रयास करेंगे कि तीनों ही कर्म कैसे करने से क्या सफलता मिलती तथा कहां हमसे चूक होती है और हम क्यों उसके फल से वंचित रह जाते हैं। तंत्र क्या है, मंत्र क्या है और जंतर (ताबीज) क्या

है कैसे काम करता है। शास्त्र में कहा गया है कि अन्न, मंत्र और रत्न में शक्ति है। अन्न की शक्ति तो हम देखते है, मंत्र और रत्न की शक्ति कहां छुपी है सबको क्यों प्राप्त नहीं होती उसे कैसे प्राप्त कर सकते हैं तथा उसके क्या फायदे है।

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आज के समय में लोगों का अपने धर्म और रीति रिवाजों के प्रति उदासीनता आम बात हैं लोगों को कहते हुए सुना गया है कि ये रीति रिवाज हमें नहीं करना इसमे मैं परेशानी महसूस करता हूँ, या मेरे पास इतना समय नहीं है, या मैं इतनी देर तक नहीं बैठ पाऊँगा मुझे दर्द होने लगता है, या अरे यार ये फालतू का काम है मैं नहीं करता ये सब इत्यादि । बहुत लोग तो ये भी कहते हैं, अरे ये सब ढोंग है, ये पंडितों के द्वारा ठगा जाना है इत्यादी।
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आज बहुत से बाबा और संत है फिर भी लोगों तक सही ज्ञान नहीं पहुंच पाता इसका कारण ये हो सकता है कि या तो हमारे धर्मगुरु सही से हमें बताते नहीं, या फिर हम उनकी बातों में अपना दिमाग लगा देते हैं, या फिर हम उनकी बातों को समझना नहीं चाहते । अब देखें की उनकी बातों में हम अपना दिमाग लगाते हैं तो क्या होता है तो होना क्या है बस sauth indian डिश डोसा को अपने छोले भटुरे की तरह बना दिये और क्या?
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आज हम पूजा पाठ के विषय में चर्चा करेंगे, पूर्व में हमारे सनातन धर्म में वैदिक संस्कृति का प्रचलन था जिसमें हवन, जप, पाठ और ध्यान या चिंतन होता था । मूर्ति पूजा वैदिक नहीं है लेकिन वेदव्यासजी ने जो त्रिकालदर्शी थे कलयुग की भयावहता (यवनो का आक्रमण और उनका धर्म परिवर्तन कराना आदि, इतिहास लिखना इस विषय का उद्देश्य नहीं है) को देखकर सनातन धर्म की रक्षा हेतु पुराणों की रचना की जिसमे सनातन धर्म की पौरणिकता तथा उसका इतिहास वर्णित है साथ ही सनातन धर्म से जुडी हुई एक अलग व्यवस्था की जिसे हम " मूर्ती पूजा " कहते हैं या यूँ कहिये कि उनहोंने सनातन धर्म का विस्तार किया । यह जानना जरूरी है कि जब से आक्रमणकारी भारत में आये और लगभग उसी समय से हमने मूर्ति पूजा को प्रारम्भ किया और तभी से हम हिन्दू कहलाये, हम वैदिक पद्धति और पौराणिक पद्धति दोनों
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तत्त्व बोधिनी का अर्थ तत्व को जानना है, और तत्व को तभी जाना जा सकता है जब हमारे पास प्रज्ञा चक्षु हो अर्थात प्रज्ञा = ज्ञान, चक्षु= नेत्र, आंख, अतः हमारा उद्देश्य लोगो के मन से अविश्वास, शक, इत्यादि हटा के उनको उनके कर्म और धर्म के प्रति जगाना है। आज के समय में ऐसे लोगों की संख्या काफी हो गई है जो रिवाजो को ढकोसला या अंध विश्वास मानते हैं, प्रज्ञा चक्षु ऐसे विचारों का समर्थन करता है लेकिन सभी बातों में नहीं । जैसे मेरा एक मित्र है जो मंदिर के अन्दर नहीं जाता कभी, हम जायेंगे तो वो हमारा इंतजार बाहर में करता है, उसका कहना है कि माँ बाप ही भगवान है बांकी कोई भगवान नहीं होता, मैं उसका समर्थन करता हूँ, मैन उसको एक दिन कहा कि भाई तेरे नास्तिकता में भी आस्तिकता है वो ऐसे कि तुम भगवान (ईश्वर) के अस्तित्व को अपने माँ और पापा में देखते हो। वैसे भी धरती पे माँ, बाप और गुरु ही ईश्वर के तीन गुण हैं जैसे माँ जन्म देकर सृजन करती है यानी वो ब्रह्मा है, पिता हमारा पालन पोषण करता है जो विष्णु है और गुरु हमें ज्ञान देता है और हमारे अज्ञानता का नाश करता है जो शिव है। शिव को वैसे जगतगुरू भी कहा जाता है।
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तत्त्व बोधिनी का अर्थ तत्व को जानना है, और तत्व को तभी जाना जा सकता है जब हमारे पास प्रज्ञा चक्षु हो अर्थात प्रज्ञा = ज्ञान, चक्षु= नेत्र, आंख, अतः हमारा उद्देश्य लोगो के मन से अविश्वास, शक, इत्यादि हटा के उनको उनके कर्म और धर्म के प्रति जगाना है। आज के समय में ऐसे लोगों की संख्या काफी हो गई है जो रिवाजो को ढकोसला या अंध विश्वास मानते हैं, प्रज्ञा चक्षु ऐसे विचारों का समर्थन करता है लेकिन सभी बातों में नहीं । जैसे मेरा एक मित्र है जो मंदिर के अन्दर नहीं जाता कभी, हम जायेंगे तो वो हमारा इंतजार बाहर में करता है, उसका कहना है कि माँ बाप ही भगवान है बांकी कोई भगवान नहीं होता, मैं उसका समर्थन करता हूँ, मैन उसको एक दिन कहा कि भाई तेरे नास्तिकता में भी आस्तिकता है वो ऐसे कि तुम भगवान (ईश्वर) के अस्तित्व को अपने माँ और पापा में देखते हो। वैसे भी धरती पे माँ, बाप और गुरु ही ईश्वर के तीन गुण हैं जैसे माँ जन्म देकर सृजन करती है यानी वो ब्रह्मा है, पिता हमारा पालन पोषण करता है जो विष्णु है और गुरु हमें ज्ञान देता है और हमारे अज्ञानता का नाश करता है जो शिव है। शिव को वैसे जगतगुरू भी कहा जाता है।
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तत्त्व बोधिनी का अर्थ तत्व को जानना है, और तत्व को तभी जाना जा सकता है जब हमारे पास प्रज्ञा चक्षु हो अर्थात प्रज्ञा = ज्ञान, चक्षु= नेत्र, आंख, अतः हमारा उद्देश्य लोगो के मन से अविश्वास, शक, इत्यादि हटा के उनको उनके कर्म और धर्म के प्रति जगाना है। आज के समय में ऐसे लोगों की संख्या काफी हो गई है जो रिवाजो को ढकोसला या अंध विश्वास मानते हैं, प्रज्ञा चक्षु ऐसे विचारों का समर्थन करता है लेकिन सभी बातों में नहीं । जैसे मेरा एक मित्र है जो मंदिर के अन्दर नहीं जाता कभी, हम जायेंगे तो वो हमारा इंतजार बाहर में करता है, उसका कहना है कि माँ बाप ही भगवान है बांकी कोई भगवान नहीं होता, मैं उसका समर्थन करता हूँ, मैन उसको एक दिन कहा कि भाई तेरे नास्तिकता में भी आस्तिकता है वो ऐसे कि तुम भगवान (ईश्वर) के अस्तित्व को अपने माँ और पापा में देखते हो। वैसे भी धरती पे माँ, बाप और गुरु ही ईश्वर के तीन गुण हैं जैसे माँ जन्म देकर सृजन करती है यानी वो ब्रह्मा है, पिता हमारा पालन पोषण करता है जो विष्णु है और गुरु हमें ज्ञान देता है और हमारे अज्ञानता का नाश करता है जो शिव है। शिव को वैसे जगतगुरू भी कहा जाता है।
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तत्त्व बोधिनी का अर्थ तत्व को जानना है, और तत्व को तभी जाना जा सकता है जब हमारे पास प्रज्ञा चक्षु हो अर्थात प्रज्ञा = ज्ञान, चक्षु= नेत्र, आंख, अतः हमारा उद्देश्य लोगो के मन से अविश्वास, शक, इत्यादि हटा के उनको उनके कर्म और धर्म के प्रति जगाना है। आज के समय में ऐसे लोगों की संख्या काफी हो गई है जो रिवाजो को ढकोसला या अंध विश्वास मानते हैं, प्रज्ञा चक्षु ऐसे विचारों का समर्थन करता है लेकिन सभी बातों में नहीं । जैसे मेरा एक मित्र है जो मंदिर के अन्दर नहीं जाता कभी, हम जायेंगे तो वो हमारा इंतजार बाहर में करता है, उसका कहना है कि माँ बाप ही भगवान है बांकी कोई भगवान नहीं होता, मैं उसका समर्थन करता हूँ, मैन उसको एक दिन कहा कि भाई तेरे नास्तिकता में भी आस्तिकता है वो ऐसे कि तुम भगवान (ईश्वर) के अस्तित्व को अपने माँ और पापा में देखते हो। वैसे भी धरती पे माँ, बाप और गुरु ही ईश्वर के तीन गुण हैं जैसे माँ जन्म देकर सृजन करती है यानी वो ब्रह्मा है, पिता हमारा पालन पोषण करता है जो विष्णु है और गुरु हमें ज्ञान देता है और हमारे अज्ञानता का नाश करता है जो शिव है। शिव को वैसे जगतगुरू भी कहा जाता है।
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तत्त्व बोधिनी का अर्थ तत्व को जानना है, और तत्व को तभी जाना जा सकता है जब हमारे पास प्रज्ञा चक्षु हो अर्थात प्रज्ञा = ज्ञान, चक्षु= नेत्र, आंख, अतः हमारा उद्देश्य लोगो के मन से अविश्वास, शक, इत्यादि हटा के उनको उनके कर्म और धर्म के प्रति जगाना है। आज के समय में ऐसे लोगों की संख्या काफी हो गई है जो रिवाजो को ढकोसला या अंध विश्वास मानते हैं, प्रज्ञा चक्षु ऐसे विचारों का समर्थन करता है लेकिन सभी बातों में नहीं । जैसे मेरा एक मित्र है जो मंदिर के अन्दर नहीं जाता कभी, हम जायेंगे तो वो हमारा इंतजार बाहर में करता है, उसका कहना है कि माँ बाप ही भगवान है बांकी कोई भगवान नहीं होता, मैं उसका समर्थन करता हूँ, मैन उसको एक दिन कहा कि भाई तेरे नास्तिकता में भी आस्तिकता है वो ऐसे कि तुम भगवान (ईश्वर) के अस्तित्व को अपने माँ और पापा में देखते हो। वैसे भी धरती पे माँ, बाप और गुरु ही ईश्वर के तीन गुण हैं जैसे माँ जन्म देकर सृजन करती है यानी वो ब्रह्मा है, पिता हमारा पालन पोषण करता है जो विष्णु है और गुरु हमें ज्ञान देता है और हमारे अज्ञानता का नाश करता है जो शिव है। शिव को वैसे जगतगुरू भी कहा जाता है।
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तत्त्व बोधिनी का अर्थ तत्व को जानना है, और तत्व को तभी जाना जा सकता है जब हमारे पास प्रज्ञा चक्षु हो अर्थात प्रज्ञा = ज्ञान, चक्षु= नेत्र, आंख, अतः हमारा उद्देश्य लोगो के मन से अविश्वास, शक, इत्यादि हटा के उनको उनके कर्म और धर्म के प्रति जगाना है। आज के समय में ऐसे लोगों की संख्या काफी हो गई है जो रिवाजो को ढकोसला या अंध विश्वास मानते हैं, प्रज्ञा चक्षु ऐसे विचारों का समर्थन करता है लेकिन सभी बातों में नहीं । जैसे मेरा एक मित्र है जो मंदिर के अन्दर नहीं जाता कभी, हम जायेंगे तो वो हमारा इंतजार बाहर में करता है, उसका कहना है कि माँ बाप ही भगवान है बांकी कोई भगवान नहीं होता, मैं उसका समर्थन करता हूँ, मैन उसको एक दिन कहा कि भाई तेरे नास्तिकता में भी आस्तिकता है वो ऐसे कि तुम भगवान (ईश्वर) के अस्तित्व को अपने माँ और पापा में देखते हो। वैसे भी धरती पे माँ, बाप और गुरु ही ईश्वर के तीन गुण हैं जैसे माँ जन्म देकर सृजन करती है यानी वो ब्रह्मा है, पिता हमारा पालन पोषण करता है जो विष्णु है और गुरु हमें ज्ञान देता है और हमारे अज्ञानता का नाश करता है जो शिव है। शिव को वैसे जगतगुरू भी कहा जाता है।
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तत्त्व बोधिनी का अर्थ तत्व को जानना है, और तत्व को तभी जाना जा सकता है जब हमारे पास प्रज्ञा चक्षु हो अर्थात प्रज्ञा = ज्ञान, चक्षु= नेत्र, आंख, अतः हमारा उद्देश्य लोगो के मन से अविश्वास, शक, इत्यादि हटा के उनको उनके कर्म और धर्म के प्रति जगाना है। आज के समय में ऐसे लोगों की संख्या काफी हो गई है जो रिवाजो को ढकोसला या अंध विश्वास मानते हैं, प्रज्ञा चक्षु ऐसे विचारों का समर्थन करता है लेकिन सभी बातों में नहीं । जैसे मेरा एक मित्र है जो मंदिर के अन्दर नहीं जाता कभी, हम जायेंगे तो वो हमारा इंतजार बाहर में करता है, उसका कहना है कि माँ बाप ही भगवान है बांकी कोई भगवान नहीं होता, मैं उसका समर्थन करता हूँ, मैन उसको एक दिन कहा कि भाई तेरे नास्तिकता में भी आस्तिकता है वो ऐसे कि तुम भगवान (ईश्वर) के अस्तित्व को अपने माँ और पापा में देखते हो। वैसे भी धरती पे माँ, बाप और गुरु ही ईश्वर के तीन गुण हैं जैसे माँ जन्म देकर सृजन करती है यानी वो ब्रह्मा है, पिता हमारा पालन पोषण करता है जो विष्णु है और गुरु हमें ज्ञान देता है और हमारे अज्ञानता का नाश करता है जो शिव है। शिव को वैसे जगतगुरू भी कहा जाता है।
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तत्त्व बोधिनी का अर्थ तत्व को जानना है, और तत्व को तभी जाना जा सकता है जब हमारे पास प्रज्ञा चक्षु हो अर्थात प्रज्ञा = ज्ञान, चक्षु= नेत्र, आंख, अतः हमारा उद्देश्य लोगो के मन से अविश्वास, शक, इत्यादि हटा के उनको उनके कर्म और धर्म के प्रति जगाना है। आज के समय में ऐसे लोगों की संख्या काफी हो गई है जो रिवाजो को ढकोसला या अंध विश्वास मानते हैं, प्रज्ञा चक्षु ऐसे विचारों का समर्थन करता है लेकिन सभी बातों में नहीं । जैसे मेरा एक मित्र है जो मंदिर के अन्दर नहीं जाता कभी, हम जायेंगे तो वो हमारा इंतजार बाहर में करता है, उसका कहना है कि माँ बाप ही भगवान है बांकी कोई भगवान नहीं होता, मैं उसका समर्थन करता हूँ, मैन उसको एक दिन कहा कि भाई तेरे नास्तिकता में भी आस्तिकता है वो ऐसे कि तुम भगवान (ईश्वर) के अस्तित्व को अपने माँ और पापा में देखते हो। वैसे भी धरती पे माँ, बाप और गुरु ही ईश्वर के तीन गुण हैं जैसे माँ जन्म देकर सृजन करती है यानी वो ब्रह्मा है, पिता हमारा पालन पोषण करता है जो विष्णु है और गुरु हमें ज्ञान देता है और हमारे अज्ञानता का नाश करता है जो शिव है। शिव को वैसे जगतगुरू भी कहा जाता है।
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तत्त्व बोधिनी का अर्थ तत्व को जानना है, और तत्व को तभी जाना जा सकता है जब हमारे पास प्रज्ञा चक्षु हो अर्थात प्रज्ञा = ज्ञान, चक्षु= नेत्र, आंख, अतः हमारा उद्देश्य लोगो के मन से अविश्वास, शक, इत्यादि हटा के उनको उनके कर्म और धर्म के प्रति जगाना है। आज के समय में ऐसे लोगों की संख्या काफी हो गई है जो रिवाजो को ढकोसला या अंध विश्वास मानते हैं, प्रज्ञा चक्षु ऐसे विचारों का समर्थन करता है लेकिन सभी बातों में नहीं । जैसे मेरा एक मित्र है जो मंदिर के अन्दर नहीं जाता कभी, हम जायेंगे तो वो हमारा इंतजार बाहर में करता है, उसका कहना है कि माँ बाप ही भगवान है बांकी कोई भगवान नहीं होता, मैं उसका समर्थन करता हूँ, मैन उसको एक दिन कहा कि भाई तेरे नास्तिकता में भी आस्तिकता है वो ऐसे कि तुम भगवान (ईश्वर) के अस्तित्व को अपने माँ और पापा में देखते हो। वैसे भी धरती पे माँ, बाप और गुरु ही ईश्वर के तीन गुण हैं जैसे माँ जन्म देकर सृजन करती है यानी वो ब्रह्मा है, पिता हमारा पालन पोषण करता है जो विष्णु है और गुरु हमें ज्ञान देता है और हमारे अज्ञानता का नाश करता है जो शिव है। शिव को वैसे जगतगुरू भी कहा जाता है।
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तत्त्व बोधिनी का अर्थ तत्व को जानना है, और तत्व को तभी जाना जा सकता है जब हमारे पास प्रज्ञा चक्षु हो अर्थात प्रज्ञा = ज्ञान, चक्षु= नेत्र, आंख, अतः हमारा उद्देश्य लोगो के मन से अविश्वास, शक, इत्यादि हटा के उनको उनके कर्म और धर्म के प्रति जगाना है। आज के समय में ऐसे लोगों की संख्या काफी हो गई है जो रिवाजो को ढकोसला या अंध विश्वास मानते हैं, प्रज्ञा चक्षु ऐसे विचारों का समर्थन करता है लेकिन सभी बातों में नहीं । जैसे मेरा एक मित्र है जो मंदिर के अन्दर नहीं जाता कभी, हम जायेंगे तो वो हमारा इंतजार बाहर में करता है, उसका कहना है कि माँ बाप ही भगवान है बांकी कोई भगवान नहीं होता, मैं उसका समर्थन करता हूँ, मैन उसको एक दिन कहा कि भाई तेरे नास्तिकता में भी आस्तिकता है वो ऐसे कि तुम भगवान (ईश्वर) के अस्तित्व को अपने माँ और पापा में देखते हो। वैसे भी धरती पे माँ, बाप और गुरु ही ईश्वर के तीन गुण हैं जैसे माँ जन्म देकर सृजन करती है यानी वो ब्रह्मा है, पिता हमारा पालन पोषण करता है जो विष्णु है और गुरु हमें ज्ञान देता है और हमारे अज्ञानता का नाश करता है जो शिव है। शिव को वैसे जगतगुरू भी कहा जाता है।
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