TatwaBodhani ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते | पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवा वशिष्यते ||

Astrology

ज्योतिष शास्त्र को वेद का आँख कहा गया है, और आँख का काम देखना है इसीलिए ज्योतिष के माध्यम से निकट भविष्य को देखा जा सकता है और उसे कुछ हद तक सुधारा जा सकता है।

हरेक मनुष्य भविष्य जानने को उत्सुक रहता है चाहे स्वयं के विषय में हो या समाज के विषय में या फिर देश दुनियाँ के विषय में इसलिए दुनियाँ के हरेक सभ्यता में भविष्य जानने के लिए कोई न कोई पद्धति होती है जैसे माया पद्धत्ति, यवन पद्धत्ति, मिश्र पद्धत्ति इत्यादि। मानव इतिहास जितना पुराना है भविष्यवाणी करने की पद्धति भी लगभग उतनी ही पुरानी है हजारों वर्षों से छोटी तथा बड़ी भविष्यवाणियां होती रही है जिसमे कुछ सच भी साबित होने का दवा किया जाता है। दुनियां के सभी आदिवासी कबीला या यायावर(खानाबदोश) जनजाति तक सभी में किसी न किसी रूप में छोटी छोटी भविष्वाणी करने की अपनी अपनी पद्धति है। जो संस्कृति जितनी प्राचीन और विस्तृत है उस संस्कृति की भविष्य जानने की पद्धति भी उतनी ही विस्तृत और भरोसे मंद है। विश्व में मुख्य रूप से ज्योतिष के तीन प्रकार की पद्धति प्रचलित है उनमे एक अंक ज्योतिष, दूसरा ग्रह ज्योतिष तथा तीसरा शगुन विचार। अंक ज्योतिष में एक से नौ तक के अंक और तीन सौ पैंसठ दिन को सम्मलित कर भविष्यवाणी की जाती है, जो मनुष्य के जीवन से संबंधित भविष्यवाणी के लिए अंक ज्योतिष प्रसिद्ध है। दूसरा ग्रह ज्योतिष जिसमें नौ ग्रह बारह राशि तथा सताइस नक्षत्र सम्मलित कर भविष्यवाणी किया जाता है जिसमें मनुष्य के जीवन से लेकर पशुपक्षी तक का भविष्य जानने के साथ साथ मनुष्य के जीवन से संबंधित समस्त विषयों की भविष्यवाणी जैसे प्रकृति से संबंद्धित जैसे वर्षा, फसल की उपज बाजार में बिकने वाले समस्त सामानों के भाव के उतार चढ़ाव से संबंधित भविष्यवाणी प्रमुख है इसके अलावा वास्तु से संबंधित जानकारी तथा मुहूर्त यानि कौन सा काम कब किया जाना चाहिए इन समस्त जानकारी के लिए ग्रह ज्योतिष प्रसिद्ध है । ग्रह ज्योतिष में भारतीय ज्योतिष शास्त्र सम्पूर्ण विश्व में प्रख्यात है। तथा तीसरा जो नाम मे ही पहचान है अर्थात आँख का फरकना, छींक, चिड़ियों का बोलना, इत्यादि। ज्योतिष शास्त्र की मूल भाषा संस्कृत है जिसे देववाणी भी कहते हैं। ज्योतिष शास्त्र इतना विस्तार है कि उसका सम्पूर्ण ज्ञान पाना बहुत ही कठिन है, ज्योतिष शास्त्र के जानकार को ज्योतिषी कहागया है और ज्योतिषी की परिभाषा निम्न श्लोक में मिलता है, विधाता लिखित्वा ललाटे अक्षर मालिका, दैवज्ञस्तां पठेद व्यक्तं होरा नर्मल चक्षुषा । विधाता यानि ब्रह्माजी जो कुछ भी मनुष्य के ललाट में लिखे हैं दैवज्ञ यानि ज्योतिषी उसे पढ़कर व्यक्त करता है, और ज्योतिष शास्त्र द्वारा किया गया भविष्यवाणी की सफलता के विषय में कहा गया है कि, मन्त्रे तीर्थे द्विजे देवे दैवज्ञे भेषजे गुरौ, यादृशी भावना यश्य सिद्धिर्भवति तादृशी । याने मंत्र तीर्थ ब्राह्मण देवता ज्योतिष दवा और गुरु, इन सबके प्रति जैसी भावना होगी वैसी सफलता मिलेगी । ज्योतिष शास्त्र का मुख्य रूप से तीन विभाग है पहला सिद्धांत जो ग्रहों के संचार का विषय है, दूसरा होरा जो मनुष्य के जन्म से मृत्यु तक का भविष्यवाणी करता है और तीसरा मुहूर्त के विषय से अवगत कराता है । तीनों ही विद्या नौ ग्रह और बारह राशि से संबंधित है राशि को ही लग्न भी कहते हैं और लग्न को ही मुहूर्त भी कहते हैं। अतः यह इतना उलझा हुआ विषय है कि इसे बुद्धिमान व्यक्ति ही समझ सकता है। जिस तरह आज का विज्ञान के विषय को प्रतिभावान विद्यार्थी ही अध्यन कर सकता है उसी तरह ज्योतिष शास्त्र का अध्यन भी प्रतिभावान विद्यर्थी ही कर सकता है, ज्योतिष शास्त्र प्रचीन काल का विज्ञान ही है जो आज के विज्ञान से अधिक उन्नत है। ज्योतिष शास्त्र का अध्यन कर एक सफल ज्योतिषी बनने के लिए विद्या होने के साथ ही उत्तम संस्कार तथा ईश्वर के प्रति भक्ति होना भी आवश्यक है । ज्योतिष विद्या के सभी भविष्यवाणी और ग्रहों का फल गणित पर आधारित है, अर्थात ज्योतिष ही गणित है।

Stree
तत्त्व बोधिनी का अर्थ तत्व को जानना है, और तत्व को तभी जाना जा सकता है जब हमारे पास प्रज्ञा चक्षु हो अर्थात प्रज्ञा = ज्ञान, चक्षु= नेत्र, आंख, अतः हमारा उद्देश्य लोगो के मन से अविश्वास, शक, इत्यादि हटा के उनको उनके कर्म और धर्म के प्रति जगाना है। आज के समय में ऐसे लोगों की संख्या काफी हो गई है जो रिवाजो को ढकोसला या अंध विश्वास मानते हैं, प्रज्ञा चक्षु ऐसे विचारों का समर्थन करता है लेकिन सभी बातों में नहीं । जैसे मेरा एक मित्र है जो मंदिर के अन्दर नहीं जाता कभी, हम जायेंगे तो वो हमारा इंतजार बाहर में करता है, उसका कहना है कि माँ बाप ही भगवान है बांकी कोई भगवान नहीं होता, मैं उसका समर्थन करता हूँ, मैन उसको एक दिन कहा कि भाई तेरे नास्तिकता में भी आस्तिकता है वो ऐसे कि तुम भगवान (ईश्वर) के अस्तित्व को अपने माँ और पापा में देखते हो। वैसे भी धरती पे माँ, बाप और गुरु ही ईश्वर के तीन गुण हैं जैसे माँ जन्म देकर सृजन करती है यानी वो ब्रह्मा है, पिता हमारा पालन पोषण करता है जो विष्णु है और गुरु हमें ज्ञान देता है और हमारे अज्ञानता का नाश करता है जो शिव है। शिव को वैसे जगतगुरू भी कहा जाता है।
Stree
तत्त्व बोधिनी का अर्थ तत्व को जानना है, और तत्व को तभी जाना जा सकता है जब हमारे पास प्रज्ञा चक्षु हो अर्थात प्रज्ञा = ज्ञान, चक्षु= नेत्र, आंख, अतः हमारा उद्देश्य लोगो के मन से अविश्वास, शक, इत्यादि हटा के उनको उनके कर्म और धर्म के प्रति जगाना है। आज के समय में ऐसे लोगों की संख्या काफी हो गई है जो रिवाजो को ढकोसला या अंध विश्वास मानते हैं, प्रज्ञा चक्षु ऐसे विचारों का समर्थन करता है लेकिन सभी बातों में नहीं । जैसे मेरा एक मित्र है जो मंदिर के अन्दर नहीं जाता कभी, हम जायेंगे तो वो हमारा इंतजार बाहर में करता है, उसका कहना है कि माँ बाप ही भगवान है बांकी कोई भगवान नहीं होता, मैं उसका समर्थन करता हूँ, मैन उसको एक दिन कहा कि भाई तेरे नास्तिकता में भी आस्तिकता है वो ऐसे कि तुम भगवान (ईश्वर) के अस्तित्व को अपने माँ और पापा में देखते हो। वैसे भी धरती पे माँ, बाप और गुरु ही ईश्वर के तीन गुण हैं जैसे माँ जन्म देकर सृजन करती है यानी वो ब्रह्मा है, पिता हमारा पालन पोषण करता है जो विष्णु है और गुरु हमें ज्ञान देता है और हमारे अज्ञानता का नाश करता है जो शिव है। शिव को वैसे जगतगुरू भी कहा जाता है।
Stree
तत्त्व बोधिनी का अर्थ तत्व को जानना है, और तत्व को तभी जाना जा सकता है जब हमारे पास प्रज्ञा चक्षु हो अर्थात प्रज्ञा = ज्ञान, चक्षु= नेत्र, आंख, अतः हमारा उद्देश्य लोगो के मन से अविश्वास, शक, इत्यादि हटा के उनको उनके कर्म और धर्म के प्रति जगाना है। आज के समय में ऐसे लोगों की संख्या काफी हो गई है जो रिवाजो को ढकोसला या अंध विश्वास मानते हैं, प्रज्ञा चक्षु ऐसे विचारों का समर्थन करता है लेकिन सभी बातों में नहीं । जैसे मेरा एक मित्र है जो मंदिर के अन्दर नहीं जाता कभी, हम जायेंगे तो वो हमारा इंतजार बाहर में करता है, उसका कहना है कि माँ बाप ही भगवान है बांकी कोई भगवान नहीं होता, मैं उसका समर्थन करता हूँ, मैन उसको एक दिन कहा कि भाई तेरे नास्तिकता में भी आस्तिकता है वो ऐसे कि तुम भगवान (ईश्वर) के अस्तित्व को अपने माँ और पापा में देखते हो। वैसे भी धरती पे माँ, बाप और गुरु ही ईश्वर के तीन गुण हैं जैसे माँ जन्म देकर सृजन करती है यानी वो ब्रह्मा है, पिता हमारा पालन पोषण करता है जो विष्णु है और गुरु हमें ज्ञान देता है और हमारे अज्ञानता का नाश करता है जो शिव है। शिव को वैसे जगतगुरू भी कहा जाता है।
Stree
तत्त्व बोधिनी का अर्थ तत्व को जानना है, और तत्व को तभी जाना जा सकता है जब हमारे पास प्रज्ञा चक्षु हो अर्थात प्रज्ञा = ज्ञान, चक्षु= नेत्र, आंख, अतः हमारा उद्देश्य लोगो के मन से अविश्वास, शक, इत्यादि हटा के उनको उनके कर्म और धर्म के प्रति जगाना है। आज के समय में ऐसे लोगों की संख्या काफी हो गई है जो रिवाजो को ढकोसला या अंध विश्वास मानते हैं, प्रज्ञा चक्षु ऐसे विचारों का समर्थन करता है लेकिन सभी बातों में नहीं । जैसे मेरा एक मित्र है जो मंदिर के अन्दर नहीं जाता कभी, हम जायेंगे तो वो हमारा इंतजार बाहर में करता है, उसका कहना है कि माँ बाप ही भगवान है बांकी कोई भगवान नहीं होता, मैं उसका समर्थन करता हूँ, मैन उसको एक दिन कहा कि भाई तेरे नास्तिकता में भी आस्तिकता है वो ऐसे कि तुम भगवान (ईश्वर) के अस्तित्व को अपने माँ और पापा में देखते हो। वैसे भी धरती पे माँ, बाप और गुरु ही ईश्वर के तीन गुण हैं जैसे माँ जन्म देकर सृजन करती है यानी वो ब्रह्मा है, पिता हमारा पालन पोषण करता है जो विष्णु है और गुरु हमें ज्ञान देता है और हमारे अज्ञानता का नाश करता है जो शिव है। शिव को वैसे जगतगुरू भी कहा जाता है।
Stree
तत्त्व बोधिनी का अर्थ तत्व को जानना है, और तत्व को तभी जाना जा सकता है जब हमारे पास प्रज्ञा चक्षु हो अर्थात प्रज्ञा = ज्ञान, चक्षु= नेत्र, आंख, अतः हमारा उद्देश्य लोगो के मन से अविश्वास, शक, इत्यादि हटा के उनको उनके कर्म और धर्म के प्रति जगाना है। आज के समय में ऐसे लोगों की संख्या काफी हो गई है जो रिवाजो को ढकोसला या अंध विश्वास मानते हैं, प्रज्ञा चक्षु ऐसे विचारों का समर्थन करता है लेकिन सभी बातों में नहीं । जैसे मेरा एक मित्र है जो मंदिर के अन्दर नहीं जाता कभी, हम जायेंगे तो वो हमारा इंतजार बाहर में करता है, उसका कहना है कि माँ बाप ही भगवान है बांकी कोई भगवान नहीं होता, मैं उसका समर्थन करता हूँ, मैन उसको एक दिन कहा कि भाई तेरे नास्तिकता में भी आस्तिकता है वो ऐसे कि तुम भगवान (ईश्वर) के अस्तित्व को अपने माँ और पापा में देखते हो। वैसे भी धरती पे माँ, बाप और गुरु ही ईश्वर के तीन गुण हैं जैसे माँ जन्म देकर सृजन करती है यानी वो ब्रह्मा है, पिता हमारा पालन पोषण करता है जो विष्णु है और गुरु हमें ज्ञान देता है और हमारे अज्ञानता का नाश करता है जो शिव है। शिव को वैसे जगतगुरू भी कहा जाता है।
Stree
तत्त्व बोधिनी का अर्थ तत्व को जानना है, और तत्व को तभी जाना जा सकता है जब हमारे पास प्रज्ञा चक्षु हो अर्थात प्रज्ञा = ज्ञान, चक्षु= नेत्र, आंख, अतः हमारा उद्देश्य लोगो के मन से अविश्वास, शक, इत्यादि हटा के उनको उनके कर्म और धर्म के प्रति जगाना है। आज के समय में ऐसे लोगों की संख्या काफी हो गई है जो रिवाजो को ढकोसला या अंध विश्वास मानते हैं, प्रज्ञा चक्षु ऐसे विचारों का समर्थन करता है लेकिन सभी बातों में नहीं । जैसे मेरा एक मित्र है जो मंदिर के अन्दर नहीं जाता कभी, हम जायेंगे तो वो हमारा इंतजार बाहर में करता है, उसका कहना है कि माँ बाप ही भगवान है बांकी कोई भगवान नहीं होता, मैं उसका समर्थन करता हूँ, मैन उसको एक दिन कहा कि भाई तेरे नास्तिकता में भी आस्तिकता है वो ऐसे कि तुम भगवान (ईश्वर) के अस्तित्व को अपने माँ और पापा में देखते हो। वैसे भी धरती पे माँ, बाप और गुरु ही ईश्वर के तीन गुण हैं जैसे माँ जन्म देकर सृजन करती है यानी वो ब्रह्मा है, पिता हमारा पालन पोषण करता है जो विष्णु है और गुरु हमें ज्ञान देता है और हमारे अज्ञानता का नाश करता है जो शिव है। शिव को वैसे जगतगुरू भी कहा जाता है।
Stree
तत्त्व बोधिनी का अर्थ तत्व को जानना है, और तत्व को तभी जाना जा सकता है जब हमारे पास प्रज्ञा चक्षु हो अर्थात प्रज्ञा = ज्ञान, चक्षु= नेत्र, आंख, अतः हमारा उद्देश्य लोगो के मन से अविश्वास, शक, इत्यादि हटा के उनको उनके कर्म और धर्म के प्रति जगाना है। आज के समय में ऐसे लोगों की संख्या काफी हो गई है जो रिवाजो को ढकोसला या अंध विश्वास मानते हैं, प्रज्ञा चक्षु ऐसे विचारों का समर्थन करता है लेकिन सभी बातों में नहीं । जैसे मेरा एक मित्र है जो मंदिर के अन्दर नहीं जाता कभी, हम जायेंगे तो वो हमारा इंतजार बाहर में करता है, उसका कहना है कि माँ बाप ही भगवान है बांकी कोई भगवान नहीं होता, मैं उसका समर्थन करता हूँ, मैन उसको एक दिन कहा कि भाई तेरे नास्तिकता में भी आस्तिकता है वो ऐसे कि तुम भगवान (ईश्वर) के अस्तित्व को अपने माँ और पापा में देखते हो। वैसे भी धरती पे माँ, बाप और गुरु ही ईश्वर के तीन गुण हैं जैसे माँ जन्म देकर सृजन करती है यानी वो ब्रह्मा है, पिता हमारा पालन पोषण करता है जो विष्णु है और गुरु हमें ज्ञान देता है और हमारे अज्ञानता का नाश करता है जो शिव है। शिव को वैसे जगतगुरू भी कहा जाता है।
Stree
तत्त्व बोधिनी का अर्थ तत्व को जानना है, और तत्व को तभी जाना जा सकता है जब हमारे पास प्रज्ञा चक्षु हो अर्थात प्रज्ञा = ज्ञान, चक्षु= नेत्र, आंख, अतः हमारा उद्देश्य लोगो के मन से अविश्वास, शक, इत्यादि हटा के उनको उनके कर्म और धर्म के प्रति जगाना है। आज के समय में ऐसे लोगों की संख्या काफी हो गई है जो रिवाजो को ढकोसला या अंध विश्वास मानते हैं, प्रज्ञा चक्षु ऐसे विचारों का समर्थन करता है लेकिन सभी बातों में नहीं । जैसे मेरा एक मित्र है जो मंदिर के अन्दर नहीं जाता कभी, हम जायेंगे तो वो हमारा इंतजार बाहर में करता है, उसका कहना है कि माँ बाप ही भगवान है बांकी कोई भगवान नहीं होता, मैं उसका समर्थन करता हूँ, मैन उसको एक दिन कहा कि भाई तेरे नास्तिकता में भी आस्तिकता है वो ऐसे कि तुम भगवान (ईश्वर) के अस्तित्व को अपने माँ और पापा में देखते हो। वैसे भी धरती पे माँ, बाप और गुरु ही ईश्वर के तीन गुण हैं जैसे माँ जन्म देकर सृजन करती है यानी वो ब्रह्मा है, पिता हमारा पालन पोषण करता है जो विष्णु है और गुरु हमें ज्ञान देता है और हमारे अज्ञानता का नाश करता है जो शिव है। शिव को वैसे जगतगुरू भी कहा जाता है।
Stree
तत्त्व बोधिनी का अर्थ तत्व को जानना है, और तत्व को तभी जाना जा सकता है जब हमारे पास प्रज्ञा चक्षु हो अर्थात प्रज्ञा = ज्ञान, चक्षु= नेत्र, आंख, अतः हमारा उद्देश्य लोगो के मन से अविश्वास, शक, इत्यादि हटा के उनको उनके कर्म और धर्म के प्रति जगाना है। आज के समय में ऐसे लोगों की संख्या काफी हो गई है जो रिवाजो को ढकोसला या अंध विश्वास मानते हैं, प्रज्ञा चक्षु ऐसे विचारों का समर्थन करता है लेकिन सभी बातों में नहीं । जैसे मेरा एक मित्र है जो मंदिर के अन्दर नहीं जाता कभी, हम जायेंगे तो वो हमारा इंतजार बाहर में करता है, उसका कहना है कि माँ बाप ही भगवान है बांकी कोई भगवान नहीं होता, मैं उसका समर्थन करता हूँ, मैन उसको एक दिन कहा कि भाई तेरे नास्तिकता में भी आस्तिकता है वो ऐसे कि तुम भगवान (ईश्वर) के अस्तित्व को अपने माँ और पापा में देखते हो। वैसे भी धरती पे माँ, बाप और गुरु ही ईश्वर के तीन गुण हैं जैसे माँ जन्म देकर सृजन करती है यानी वो ब्रह्मा है, पिता हमारा पालन पोषण करता है जो विष्णु है और गुरु हमें ज्ञान देता है और हमारे अज्ञानता का नाश करता है जो शिव है। शिव को वैसे जगतगुरू भी कहा जाता है।
Stree
तत्त्व बोधिनी का अर्थ तत्व को जानना है, और तत्व को तभी जाना जा सकता है जब हमारे पास प्रज्ञा चक्षु हो अर्थात प्रज्ञा = ज्ञान, चक्षु= नेत्र, आंख, अतः हमारा उद्देश्य लोगो के मन से अविश्वास, शक, इत्यादि हटा के उनको उनके कर्म और धर्म के प्रति जगाना है। आज के समय में ऐसे लोगों की संख्या काफी हो गई है जो रिवाजो को ढकोसला या अंध विश्वास मानते हैं, प्रज्ञा चक्षु ऐसे विचारों का समर्थन करता है लेकिन सभी बातों में नहीं । जैसे मेरा एक मित्र है जो मंदिर के अन्दर नहीं जाता कभी, हम जायेंगे तो वो हमारा इंतजार बाहर में करता है, उसका कहना है कि माँ बाप ही भगवान है बांकी कोई भगवान नहीं होता, मैं उसका समर्थन करता हूँ, मैन उसको एक दिन कहा कि भाई तेरे नास्तिकता में भी आस्तिकता है वो ऐसे कि तुम भगवान (ईश्वर) के अस्तित्व को अपने माँ और पापा में देखते हो। वैसे भी धरती पे माँ, बाप और गुरु ही ईश्वर के तीन गुण हैं जैसे माँ जन्म देकर सृजन करती है यानी वो ब्रह्मा है, पिता हमारा पालन पोषण करता है जो विष्णु है और गुरु हमें ज्ञान देता है और हमारे अज्ञानता का नाश करता है जो शिव है। शिव को वैसे जगतगुरू भी कहा जाता है।
Stree
तत्त्व बोधिनी का अर्थ तत्व को जानना है, और तत्व को तभी जाना जा सकता है जब हमारे पास प्रज्ञा चक्षु हो अर्थात प्रज्ञा = ज्ञान, चक्षु= नेत्र, आंख, अतः हमारा उद्देश्य लोगो के मन से अविश्वास, शक, इत्यादि हटा के उनको उनके कर्म और धर्म के प्रति जगाना है। आज के समय में ऐसे लोगों की संख्या काफी हो गई है जो रिवाजो को ढकोसला या अंध विश्वास मानते हैं, प्रज्ञा चक्षु ऐसे विचारों का समर्थन करता है लेकिन सभी बातों में नहीं । जैसे मेरा एक मित्र है जो मंदिर के अन्दर नहीं जाता कभी, हम जायेंगे तो वो हमारा इंतजार बाहर में करता है, उसका कहना है कि माँ बाप ही भगवान है बांकी कोई भगवान नहीं होता, मैं उसका समर्थन करता हूँ, मैन उसको एक दिन कहा कि भाई तेरे नास्तिकता में भी आस्तिकता है वो ऐसे कि तुम भगवान (ईश्वर) के अस्तित्व को अपने माँ और पापा में देखते हो। वैसे भी धरती पे माँ, बाप और गुरु ही ईश्वर के तीन गुण हैं जैसे माँ जन्म देकर सृजन करती है यानी वो ब्रह्मा है, पिता हमारा पालन पोषण करता है जो विष्णु है और गुरु हमें ज्ञान देता है और हमारे अज्ञानता का नाश करता है जो शिव है। शिव को वैसे जगतगुरू भी कहा जाता है।
Stree
तत्त्व बोधिनी का अर्थ तत्व को जानना है, और तत्व को तभी जाना जा सकता है जब हमारे पास प्रज्ञा चक्षु हो अर्थात प्रज्ञा = ज्ञान, चक्षु= नेत्र, आंख, अतः हमारा उद्देश्य लोगो के मन से अविश्वास, शक, इत्यादि हटा के उनको उनके कर्म और धर्म के प्रति जगाना है। आज के समय में ऐसे लोगों की संख्या काफी हो गई है जो रिवाजो को ढकोसला या अंध विश्वास मानते हैं, प्रज्ञा चक्षु ऐसे विचारों का समर्थन करता है लेकिन सभी बातों में नहीं । जैसे मेरा एक मित्र है जो मंदिर के अन्दर नहीं जाता कभी, हम जायेंगे तो वो हमारा इंतजार बाहर में करता है, उसका कहना है कि माँ बाप ही भगवान है बांकी कोई भगवान नहीं होता, मैं उसका समर्थन करता हूँ, मैन उसको एक दिन कहा कि भाई तेरे नास्तिकता में भी आस्तिकता है वो ऐसे कि तुम भगवान (ईश्वर) के अस्तित्व को अपने माँ और पापा में देखते हो। वैसे भी धरती पे माँ, बाप और गुरु ही ईश्वर के तीन गुण हैं जैसे माँ जन्म देकर सृजन करती है यानी वो ब्रह्मा है, पिता हमारा पालन पोषण करता है जो विष्णु है और गुरु हमें ज्ञान देता है और हमारे अज्ञानता का नाश करता है जो शिव है। शिव को वैसे जगतगुरू भी कहा जाता है।
Stree
तत्त्व बोधिनी का अर्थ तत्व को जानना है, और तत्व को तभी जाना जा सकता है जब हमारे पास प्रज्ञा चक्षु हो अर्थात प्रज्ञा = ज्ञान, चक्षु= नेत्र, आंख, अतः हमारा उद्देश्य लोगो के मन से अविश्वास, शक, इत्यादि हटा के उनको उनके कर्म और धर्म के प्रति जगाना है। आज के समय में ऐसे लोगों की संख्या काफी हो गई है जो रिवाजो को ढकोसला या अंध विश्वास मानते हैं, प्रज्ञा चक्षु ऐसे विचारों का समर्थन करता है लेकिन सभी बातों में नहीं । जैसे मेरा एक मित्र है जो मंदिर के अन्दर नहीं जाता कभी, हम जायेंगे तो वो हमारा इंतजार बाहर में करता है, उसका कहना है कि माँ बाप ही भगवान है बांकी कोई भगवान नहीं होता, मैं उसका समर्थन करता हूँ, मैन उसको एक दिन कहा कि भाई तेरे नास्तिकता में भी आस्तिकता है वो ऐसे कि तुम भगवान (ईश्वर) के अस्तित्व को अपने माँ और पापा में देखते हो। वैसे भी धरती पे माँ, बाप और गुरु ही ईश्वर के तीन गुण हैं जैसे माँ जन्म देकर सृजन करती है यानी वो ब्रह्मा है, पिता हमारा पालन पोषण करता है जो विष्णु है और गुरु हमें ज्ञान देता है और हमारे अज्ञानता का नाश करता है जो शिव है। शिव को वैसे जगतगुरू भी कहा जाता है।
Stree
तत्त्व बोधिनी का अर्थ तत्व को जानना है, और तत्व को तभी जाना जा सकता है जब हमारे पास प्रज्ञा चक्षु हो अर्थात प्रज्ञा = ज्ञान, चक्षु= नेत्र, आंख, अतः हमारा उद्देश्य लोगो के मन से अविश्वास, शक, इत्यादि हटा के उनको उनके कर्म और धर्म के प्रति जगाना है। आज के समय में ऐसे लोगों की संख्या काफी हो गई है जो रिवाजो को ढकोसला या अंध विश्वास मानते हैं, प्रज्ञा चक्षु ऐसे विचारों का समर्थन करता है लेकिन सभी बातों में नहीं । जैसे मेरा एक मित्र है जो मंदिर के अन्दर नहीं जाता कभी, हम जायेंगे तो वो हमारा इंतजार बाहर में करता है, उसका कहना है कि माँ बाप ही भगवान है बांकी कोई भगवान नहीं होता, मैं उसका समर्थन करता हूँ, मैन उसको एक दिन कहा कि भाई तेरे नास्तिकता में भी आस्तिकता है वो ऐसे कि तुम भगवान (ईश्वर) के अस्तित्व को अपने माँ और पापा में देखते हो। वैसे भी धरती पे माँ, बाप और गुरु ही ईश्वर के तीन गुण हैं जैसे माँ जन्म देकर सृजन करती है यानी वो ब्रह्मा है, पिता हमारा पालन पोषण करता है जो विष्णु है और गुरु हमें ज्ञान देता है और हमारे अज्ञानता का नाश करता है जो शिव है। शिव को वैसे जगतगुरू भी कहा जाता है।
Stree
तत्त्व बोधिनी का अर्थ तत्व को जानना है, और तत्व को तभी जाना जा सकता है जब हमारे पास प्रज्ञा चक्षु हो अर्थात प्रज्ञा = ज्ञान, चक्षु= नेत्र, आंख, अतः हमारा उद्देश्य लोगो के मन से अविश्वास, शक, इत्यादि हटा के उनको उनके कर्म और धर्म के प्रति जगाना है। आज के समय में ऐसे लोगों की संख्या काफी हो गई है जो रिवाजो को ढकोसला या अंध विश्वास मानते हैं, प्रज्ञा चक्षु ऐसे विचारों का समर्थन करता है लेकिन सभी बातों में नहीं । जैसे मेरा एक मित्र है जो मंदिर के अन्दर नहीं जाता कभी, हम जायेंगे तो वो हमारा इंतजार बाहर में करता है, उसका कहना है कि माँ बाप ही भगवान है बांकी कोई भगवान नहीं होता, मैं उसका समर्थन करता हूँ, मैन उसको एक दिन कहा कि भाई तेरे नास्तिकता में भी आस्तिकता है वो ऐसे कि तुम भगवान (ईश्वर) के अस्तित्व को अपने माँ और पापा में देखते हो। वैसे भी धरती पे माँ, बाप और गुरु ही ईश्वर के तीन गुण हैं जैसे माँ जन्म देकर सृजन करती है यानी वो ब्रह्मा है, पिता हमारा पालन पोषण करता है जो विष्णु है और गुरु हमें ज्ञान देता है और हमारे अज्ञानता का नाश करता है जो शिव है। शिव को वैसे जगतगुरू भी कहा जाता है।
Stree
तत्त्व बोधिनी का अर्थ तत्व को जानना है, और तत्व को तभी जाना जा सकता है जब हमारे पास प्रज्ञा चक्षु हो अर्थात प्रज्ञा = ज्ञान, चक्षु= नेत्र, आंख, अतः हमारा उद्देश्य लोगो के मन से अविश्वास, शक, इत्यादि हटा के उनको उनके कर्म और धर्म के प्रति जगाना है। आज के समय में ऐसे लोगों की संख्या काफी हो गई है जो रिवाजो को ढकोसला या अंध विश्वास मानते हैं, प्रज्ञा चक्षु ऐसे विचारों का समर्थन करता है लेकिन सभी बातों में नहीं । जैसे मेरा एक मित्र है जो मंदिर के अन्दर नहीं जाता कभी, हम जायेंगे तो वो हमारा इंतजार बाहर में करता है, उसका कहना है कि माँ बाप ही भगवान है बांकी कोई भगवान नहीं होता, मैं उसका समर्थन करता हूँ, मैन उसको एक दिन कहा कि भाई तेरे नास्तिकता में भी आस्तिकता है वो ऐसे कि तुम भगवान (ईश्वर) के अस्तित्व को अपने माँ और पापा में देखते हो। वैसे भी धरती पे माँ, बाप और गुरु ही ईश्वर के तीन गुण हैं जैसे माँ जन्म देकर सृजन करती है यानी वो ब्रह्मा है, पिता हमारा पालन पोषण करता है जो विष्णु है और गुरु हमें ज्ञान देता है और हमारे अज्ञानता का नाश करता है जो शिव है। शिव को वैसे जगतगुरू भी कहा जाता है।
Stree
तत्त्व बोधिनी का अर्थ तत्व को जानना है, और तत्व को तभी जाना जा सकता है जब हमारे पास प्रज्ञा चक्षु हो अर्थात प्रज्ञा = ज्ञान, चक्षु= नेत्र, आंख, अतः हमारा उद्देश्य लोगो के मन से अविश्वास, शक, इत्यादि हटा के उनको उनके कर्म और धर्म के प्रति जगाना है। आज के समय में ऐसे लोगों की संख्या काफी हो गई है जो रिवाजो को ढकोसला या अंध विश्वास मानते हैं, प्रज्ञा चक्षु ऐसे विचारों का समर्थन करता है लेकिन सभी बातों में नहीं । जैसे मेरा एक मित्र है जो मंदिर के अन्दर नहीं जाता कभी, हम जायेंगे तो वो हमारा इंतजार बाहर में करता है, उसका कहना है कि माँ बाप ही भगवान है बांकी कोई भगवान नहीं होता, मैं उसका समर्थन करता हूँ, मैन उसको एक दिन कहा कि भाई तेरे नास्तिकता में भी आस्तिकता है वो ऐसे कि तुम भगवान (ईश्वर) के अस्तित्व को अपने माँ और पापा में देखते हो। वैसे भी धरती पे माँ, बाप और गुरु ही ईश्वर के तीन गुण हैं जैसे माँ जन्म देकर सृजन करती है यानी वो ब्रह्मा है, पिता हमारा पालन पोषण करता है जो विष्णु है और गुरु हमें ज्ञान देता है और हमारे अज्ञानता का नाश करता है जो शिव है। शिव को वैसे जगतगुरू भी कहा जाता है।
Stree
तत्त्व बोधिनी का अर्थ तत्व को जानना है, और तत्व को तभी जाना जा सकता है जब हमारे पास प्रज्ञा चक्षु हो अर्थात प्रज्ञा = ज्ञान, चक्षु= नेत्र, आंख, अतः हमारा उद्देश्य लोगो के मन से अविश्वास, शक, इत्यादि हटा के उनको उनके कर्म और धर्म के प्रति जगाना है। आज के समय में ऐसे लोगों की संख्या काफी हो गई है जो रिवाजो को ढकोसला या अंध विश्वास मानते हैं, प्रज्ञा चक्षु ऐसे विचारों का समर्थन करता है लेकिन सभी बातों में नहीं । जैसे मेरा एक मित्र है जो मंदिर के अन्दर नहीं जाता कभी, हम जायेंगे तो वो हमारा इंतजार बाहर में करता है, उसका कहना है कि माँ बाप ही भगवान है बांकी कोई भगवान नहीं होता, मैं उसका समर्थन करता हूँ, मैन उसको एक दिन कहा कि भाई तेरे नास्तिकता में भी आस्तिकता है वो ऐसे कि तुम भगवान (ईश्वर) के अस्तित्व को अपने माँ और पापा में देखते हो। वैसे भी धरती पे माँ, बाप और गुरु ही ईश्वर के तीन गुण हैं जैसे माँ जन्म देकर सृजन करती है यानी वो ब्रह्मा है, पिता हमारा पालन पोषण करता है जो विष्णु है और गुरु हमें ज्ञान देता है और हमारे अज्ञानता का नाश करता है जो शिव है। शिव को वैसे जगतगुरू भी कहा जाता है।
Stree
तत्त्व बोधिनी का अर्थ तत्व को जानना है, और तत्व को तभी जाना जा सकता है जब हमारे पास प्रज्ञा चक्षु हो अर्थात प्रज्ञा = ज्ञान, चक्षु= नेत्र, आंख, अतः हमारा उद्देश्य लोगो के मन से अविश्वास, शक, इत्यादि हटा के उनको उनके कर्म और धर्म के प्रति जगाना है। आज के समय में ऐसे लोगों की संख्या काफी हो गई है जो रिवाजो को ढकोसला या अंध विश्वास मानते हैं, प्रज्ञा चक्षु ऐसे विचारों का समर्थन करता है लेकिन सभी बातों में नहीं । जैसे मेरा एक मित्र है जो मंदिर के अन्दर नहीं जाता कभी, हम जायेंगे तो वो हमारा इंतजार बाहर में करता है, उसका कहना है कि माँ बाप ही भगवान है बांकी कोई भगवान नहीं होता, मैं उसका समर्थन करता हूँ, मैन उसको एक दिन कहा कि भाई तेरे नास्तिकता में भी आस्तिकता है वो ऐसे कि तुम भगवान (ईश्वर) के अस्तित्व को अपने माँ और पापा में देखते हो। वैसे भी धरती पे माँ, बाप और गुरु ही ईश्वर के तीन गुण हैं जैसे माँ जन्म देकर सृजन करती है यानी वो ब्रह्मा है, पिता हमारा पालन पोषण करता है जो विष्णु है और गुरु हमें ज्ञान देता है और हमारे अज्ञानता का नाश करता है जो शिव है। शिव को वैसे जगतगुरू भी कहा जाता है।
Stree
तत्त्व बोधिनी का अर्थ तत्व को जानना है, और तत्व को तभी जाना जा सकता है जब हमारे पास प्रज्ञा चक्षु हो अर्थात प्रज्ञा = ज्ञान, चक्षु= नेत्र, आंख, अतः हमारा उद्देश्य लोगो के मन से अविश्वास, शक, इत्यादि हटा के उनको उनके कर्म और धर्म के प्रति जगाना है। आज के समय में ऐसे लोगों की संख्या काफी हो गई है जो रिवाजो को ढकोसला या अंध विश्वास मानते हैं, प्रज्ञा चक्षु ऐसे विचारों का समर्थन करता है लेकिन सभी बातों में नहीं । जैसे मेरा एक मित्र है जो मंदिर के अन्दर नहीं जाता कभी, हम जायेंगे तो वो हमारा इंतजार बाहर में करता है, उसका कहना है कि माँ बाप ही भगवान है बांकी कोई भगवान नहीं होता, मैं उसका समर्थन करता हूँ, मैन उसको एक दिन कहा कि भाई तेरे नास्तिकता में भी आस्तिकता है वो ऐसे कि तुम भगवान (ईश्वर) के अस्तित्व को अपने माँ और पापा में देखते हो। वैसे भी धरती पे माँ, बाप और गुरु ही ईश्वर के तीन गुण हैं जैसे माँ जन्म देकर सृजन करती है यानी वो ब्रह्मा है, पिता हमारा पालन पोषण करता है जो विष्णु है और गुरु हमें ज्ञान देता है और हमारे अज्ञानता का नाश करता है जो शिव है। शिव को वैसे जगतगुरू भी कहा जाता है।
Youtube
Linkedin
Instagram
Pinterest