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समाज मे स्त्री का स्थान ?

आज के समय में महिलाओं की एक समस्या जोरों पर है, वो है समानता का अधिकार। महिलाएं पुरुषों के बराबर का अधिकार मांग रही हैं, वामपंथी लोग मनुस्मृति को दोषी मान के हंगामा कर रहें हैं । महिलायें समझतीं हैं कि उनके साथ ना इंसाफी हो रहा है और ये समझना उचित ही है क्योंकि आज हमारे समाज मे हो भी यही रहा है महिलाओं के प्रति हिंसा, अपमान, उनको बच्चे पैदा करना, घर की दासी समझना, रात को बिछावन पर खिलौना समझना ये सब हो रहा है। महिलाओं को कहीं पर किसी भी क्षेत्र में नॉकरी के लिए वहाँ के बॉस को बिछावन पे खुश करने का दवाब होना, क्योंकि बहुत से पुरुषों की ऐसी मानसिकता होती है कि वो महिलाओं को अपनी हवस मिटाने की वस्तु के अलावा कुछ नहीं समझते। इस तरह की मानसिकता मध्यकाल के समय विकसित हुआ था, ना कि हमारे हिन्दू धर्म से। हिन्दू धर्म मे स्त्री का सम्मान करना ही सभी जगह कहा गया है । भगवान विष्णु ने कहा है कि हे मनुष्य रामावतार में जो मैंने किया उसको और कृष्णावतार में जो मैंने कहा उसको अपने जीवन मे उतारो यानी राम का कर्म और कृष्ण का कथन ये हमारे लिए अनुकरणीय हैं । लेकिन अपनेआप को बुद्धिजीवी समझने वाले और कहने वाले लोग भगवान विष्णु के इस कथन को आज तक नहीं बताए हैं ठीक इसी तरह मनुस्मृति में भी बहुत सी बातें कही गई है लेकिन सभी को अपने जिंदगी में नहीं लाना था और कुछ लोग अपने आप को सुपर समझने और भगवान बनने के चक्कर में ऐसा कर बैठे जो आज और ज्यादा अर्थ का अनर्थ हो रहा है।

हमारे शास्त्रों में यहाँ तक कह गया है कि बिना पत्नी का कोई भी कर्म सफल नहीं होता, कोई भी पूजा पाठ भी करना हो तो पत्नी को अपने साथ रखना होता है और विवाह की तरह ही गठबंधन करके उसको पूर्ण करने होते हैं। लिखी हुई बातों को हटा देते हैं तो भी आप देखो की हिन्दू राजाओं के ऊपर जो भी सिनेमा या नाटक बना है सबमें रानी उनके साथ एक आसन पर ही बैठती थी, स्त्रियां भी युद्ध कला की शिक्षा लेती थी उदाहरण में राजा दशरथ की कैकेई (जिसने राजा दशरथ को दानवों से युद्ध मे बचाया) लो या साम्राट अशोक को तलवार डालने पे मजबूर करने वाली कलिंग की राजकुमारी। शास्त्रों में सभी जगह औरतों का सम्मान करना ही लिखा हैं और जो औरतों का सम्मान नहीं करता उसे कायर और नपुंसक की संज्ञा दी गई है। आज वामपंथी मनुस्मृति को जलाने की बात करते हैं, आज बहुत सी स्त्रीलिंग और पुलिंग अपने हवस को शांत करने के लिए धर्म शास्त्रों को गलत ठहरा कर अपने को सही शिद्ध करने की चेस्टा करते हैं

इस समाज में आदि काल से ही सबको बराबर का अधिकार दिया गया है, परंतु हमारे धर्मों के कुछ ठेकेदारों ने इसकी इज्जत उतार के अपने को श्रेष्ठ साबित करने पे लगे हैं। हमारा समाज वो समाज है जिसमे किन्नर को भी उच्च स्थान दिया उदाहरण के लिए महाभारत में द्रुपद के राजकुमार द्रोपदी का बड़ा भाई शिखण्डी को ले लीजिए। दास प्रथा थी लेकिन ऋण चुकाने के बाद उसे मुक्त कर दिया जाता था और दास को भी सम्मान दिया जाता था।

हमारे शास्त्रों में लड़कियों को आदिकाल से ही अपना पति चुनने का अधिकार रहा है, उदाहरण के लिए स्वयंवर को देखो हम ये समझते हैं कि राम ने धनुष तोड़ा तो सीता से शादी हुई या अर्जुन ने मछ्ली के आँख में वाण मारी तब द्रोपदी से शादी हुई लेकिन आपने ये नहीं देखा कि सीता को राम से प्रेम हो गया था और उसने राजा जनक से धनुष को हल्का करने का आग्रह किया था तथा माता गौरि से भी प्रार्थना की थी धनुष हल्का कर दें, तर्क ये है कि धनुष जिस स्थान पे था वो चुम्बकिय क्षेत्र था अतः उसके चुम्बकिय प्रभाव को कम करना था इसपे कभी और बात करेंगे, अब द्रौपदी के स्वयंवर में जब कर्ण ने धनुष उठा के वाण चलना चाहा तो द्रोपदी ने स्वयं उससे शादी करने से मना कर दिया, वही कर्ण अपनी प्रेमिका के स्वयंवर में उससे शादी करने गया तो लोगों ने उससे भाग लेने से मना किया और फिर कर्ण ने बाहुबल का प्रयोग किया लेकिन उसकी प्रेमिका ने उससे शादी करने से मना कर दिया और उसि सभा में कर्ण ने दासी पद्मावती से विवाह किया। ये सारी घटनाएं यही दर्शाती है कि नाड़ी को आदी काल से ही समान अधिकार प्राप्त हैं।

जब आदी काल से ही समानता का अधिकार प्राप्त है तो चूक कहाँ हुई? ये विचार करने का प्रश्न है, मेरे विचार से इसका आगमन महाभारत काल मे ही हो गया था दुर्योधन के जुए के खेल से और द्रोपदी से, उसके बाद महाभारत का युद्ध हुआ जिसमें सभी मारे गए और अकेला अभिमन्यु का पुत्र राजा परिक्षित बच गया अपनी माता के कोख में और उसके शासनकाल में ही कलियुग की सुरूआत हुई।

कलियुग यानी कल पुर्जों का युग और इस युग में ही अधर्म बढ़ना शुरू हुआ, जब मध्यकाल में स्त्रियों पर अत्यचार होने शुरू हुए हमारे हिन्दू संस्कृति में फिर भी हिन्दू नाड़ी का सम्मान होता रहा लेकिन कुछ समुदाय में नाड़ी को खिलौना समझा जाने लगा स्त्रियों के इज्जत को अपने बिछावन पे मसलना शान की बात मानी जाने लगी और इन सबसे बचने के लिए लोग अपनी बहु बेटियों पर पाबन्दी लगाने लगे जिसका परिणाम हुआ पर्दाप्रथा। इस बात का छोटा सा उदाहरण देख लीजिए बॉलीवुड की फिल्म पद्मावत, इसमे अगर वो पंडित पद्मावती का चेहरा न देखा होता तो उसके मन में बुरे विचार नहीं आते और वो राजा से अपमानित नहीं होता और खिलजी को नहीं बताता । मध्यकाल में जो शाशन व्यवस्था थी वो पशुओं की भांति थी ठीक वैसे ही जैसे एक शेर दूसरे शेर को परास्त कर उसकी सभी शेरनियों और इलाके पे कब्जा कर लेता है। स्त्रियों का मान मर्दन मध्यकाल से ही शुरू हुई और इतना विकराल रूप लिया कि आज के इस संसार में 1%लोग ही अपने मूल वंसजो की उपज हैं, बांकी सभी तो वर्णशंकर हैं। आर्य को ही देखलीजिये वो इतने सशक्त और मजबूत थे जितने आज के 10 से 15 लोग मिल कर भी नहीं हैं आर्यों की शुद्ध अनछुई पीढ़ी लद्दाख के पहाड़ों में बसते हैं और ये सबको मालूम है, अरब या अफगान के ही लोग आज जो है जो उनका शरीर है उससे 20 गुणा ज्यादा पहले था। लेकिन स्त्रियों के सम्मान का समय फिर लौट रहा है।

ज्योतिष शास्त्र में कहा गया है कि जो स्त्री कभी सपने में भी किसी पुरूष को ना याद की हो जो पुर्ण रूप से कुँआरी हो तथा जिसकी योनि पुर्ण तय शुद्ध हो, ठीक ऐसे ही जो पुरूष भी इन सारे चीजों से युक्त हो उसी दोनों के संयोग से एक उत्तम और सभी कलाओं से युक्त बच्चे का जन्म होगा।

हमारे समाज में स्त्रियों का स्थान सर्वदा से सम्माननीय रहा है उन्हें हमारे धर्म और संस्कृति में विशेष स्थान दिया गया है तो फिर ये स्थिति कैसे उतपन्न हुई कि आज समाज मे स्त्रियों के साथ अन्याय हो रहा है उनको इस्तेमाल की वस्तु समझा गया, स्त्रियों को बच्चे पैदा करने की वस्तु, हवस मिटाने का साधन और घर संभालने की नोउकरानी बना दिया गया । जबकि हमारा धर्म और संस्कृति इसकी आज्ञा नहीं देता तो फिर ऐसा कैसे हुआ? वेदों और शास्त्रों की बात छोड़िये मुहूर्त चिंतामणि में भी लिखा है कि जो दासी की तरह सेवा करे, रात को पति के पास वेश्या बन जाये, बच्चों के लिए ममता की देवी बने, बुजुर्गों के लिए पुत्री बन जाये, विपत्ति में ढाल बन जाये, वो नाड़ी सर्वदा पूजनीय ओर सम्माननिय है फिर हमारा समाज ऐसा क्यों कर रहा है? इसका जवाब है शिक्षा अर्थात जब हमारे संस्कृति का पतन होना शुरू हुआ तो सबसे पहले हमारे संस्कृति और धर्म ग्रंथों को नष्ट किया गया और हम अपने को बुराई के आगे समर्पित करते चले गए। मैं ज्योतिष का छात्र रहा हूँ उसमे भी मैन पढ़ा है कि हमारी ज्योतिष विद्या सबसे उन्नत थी जिसको खत्म कर दिया गया हमारे ग्रंथों को नष्ट कर दिया गया और यवनों के ग्रंथो ओर पद्धति को डाल दिया गया जिसका फल "ताजिक नीलकंठी" पुस्तक है परन्तु कुछ विद्वान थे जिनकी कृपा से हमारी पद्धति पूर्ण रूप से नष्ट होने से बच गया। इसी तरह हमारे धर्म को भी नष्ट करने की बहुत चेष्टा की गई परंतु कुछ लोगों की वजह से ये बचा रहा।

हमारी संस्कृति और धर्मग्रंथों के नष्ट होने के उपरांत हमारे हाथों में दूसरे की पुस्तक और संस्कृति को दे दिया गया हमें वो सब सिखाया और पढ़ाया जाने लगा जिस कारण हम स्त्रियों की ये दशा कर बैठे। आज भी हम अपनी शिक्षा का 15% भाग ही जानते और सीखते हैं हमारी शिक्षा में 85% दूसरों की हैं जिस कारण हम अभी भी अपने आप को विकसित नहीं कर पाए हैं। जिनमे ये भी एक बड़ा कारण है और वो ये की हमारे समाज में जीतने भी विद्वान लोग थे वो सभी हमारे धर्मग्रंथों को सही से हम तक नहीं पहुँचा सके क्योंकि हम गलत चीजों में अपनी आशक्ति लगा बैठे, हम अपनी संस्कृति के अपेक्षा उन चीजों में शुख और आनंद का एहसास करने लगे। गलत चीज में क्षणिक आनन्द शीघ्र ही मिलता हैं जिससे हमें अपना धर्म और संस्कृति बेकार और बोझ लगने लगा और हमारी रुचि हटने लगी। हम सम्भोग को श्रिष्टि की सबसे बड़ा आनन्द और लक्ष्य मान बैठे। आप अपने जीवन मे हर चीज का समाधान और प्रमाण पा सकते हैं अब इन बातों का उदाहरण अपने जीवन में ही देखिये कभी आपने किसी गरीब को खाना खिलाया होगा? किसी मजबूर को जब बहुत आवश्यकता होगी तब उसकी मदद की होगी? किसी स्त्री या पुरूष के सम्मान की रक्षा की होगी तो उसके बाद आपको कैसा अनुभव हुआ इसको आप क्या कहेंगे? मैं तो इसे ही परमानंद कहता हूँ, और ये तो बस छोटा सा उदाहरण है अगर आप ईश्वर के बताए अनुसार चलें तो आपको असीम सुख मिलेगा जहाँ संभोग की क्रिया एक गंदगी लगने लगेगी और आप अपने आत्म ग्लानि से भर जाएंगे। वैसे भी सही मायने में आप अपने को पढ़ के देखिए कि जब तक आपने संभोग नही किया तब तक आपको उसमे आनंद का अहसास होगा लेकिन किसी स्त्री के साथ संभोग कर लेबे के बाद आपका मन ग्लानि से जरूर सोचता होगा कि अरे ये क्या फालतू का काम कर बैठा, ओर फिर कुछ समय बाद आपके साथ वही सब होगा और आप उसी में अपना सुख फिर खोजते मिलेंगे। एक पुरूष या एक स्त्री तब तक एक दूसरे से प्रेम करता हैं जब तक वो उसके साथ संभोग नहीं कर लेता अपना मन नहीं भर लेता इसके बाद वो पुरूष या स्त्री एक दूसरे को टालने लगते हैं और फिर नये के खोज में निकल लेते हैं। आज यही हो रहा है। इसके अपेक्षा आप किसी की भलाई करने के बाद अपने आप में दो या तीन दिनों तक एक अलग ही सुख को महसूस करेंगे जो असल सुख है।

स्त्री की रचना ईश्वर ने एक पूरक के रूप में की स्त्री पुरूष का आधा हिस्सा है दोनों एक दूसरे के बिना अधूरा है। आप थोड़ी देर के लिए कल्पना कीजिये कि आपका एक हाथ, एक पैर, एक आँख सब नहीं है तो क्या होगा यही हाल है स्त्री और पुरुष का। परमेश्वर ने एक पुर्ण को दो भाग में बांट के इनकी रचना की आप खुद सोचिये की बहुत से ऐसे कार्य हैं जो स्त्रियां ही कर सकती पुरूष नहीं ठीक इसी प्रकार बहुत से कार्य सिर्फ पुरूष कर सकते हैं स्त्रियां नहीं। स्त्री में निर्माण करने की शक्ति है जो पुरुष में नहीं, स्त्री बिपत्ति में अधिक धैर्यवान होती है परंतु पुरूष अपेक्षाकृत कम। मेरी बातों को आप अपने जिंदगी और आसपास का अध्ययन करने के बाद ही समझ पाएंगे प्रमाण सहित। जब स्त्री निर्माता है तो फिर क्या आप निर्माता को अपमानित करते है? उदाहरण के लिए आप एक बड़ी कंपनी के मालिक हैं तो आप उस कंपनी के निर्माता हुए तो फिर आपको समाज मे सम्मान क्यों मिला ? आपके कंपनी में काम करने वाला अधिकारी या कर्मचारी आपके लिए ग्राहक और मुद्रा का निर्माण करता है तो उसको आप अपमानित करते है? तो फिर आपके संसार की रचना करने वाली का अपमान क्यों? ईश्वर ने एक पुर्ण का दो भाग किया स्त्री और पुरूष के रूप में यानी दोनों को बराबर बराबर रक्खा तो इस धरती पे उसे समानता का अधिकार क्यों नहीं मिलता? और वो सम्मान क्यों नहीं? वो समान ही है, वो पुजनीय है, वो सम्माननिय है लेकिन पुरुष अपने शारिरिक बल के घमंड में चूर हो के उसे छोटा बना रहा है । ये शारिरिक बल भी स्त्री ही है और ये हमें उसकी रक्षा और सम्मान के लिए मिला है लेकिन ये समाज उसका गलत उपयोग करने लगा, जैसे बंदूक बनाया गया रक्षा के लिए लेकिन लोग उसको मारने के लिए उपयोग में लाने लगे, परमाणु बम बनाया गया विद्युत के लिए लेकिन इसका उपयोग देश को खत्म करने में होने लगा।

स्त्री का कद हमारे समाज मे बहुत ही सम्माननिय और ऊँचा है । वो जननि है, निर्माता है। स्त्री को ईश्वर ने पुरूष के दुख दर्द मिटाने, उसे प्यार देने उसका उत्साह बढ़ाने के लिए उत्पन्न किया है। जिससे वो सम्मान और प्रेम की अधिकारी है। वो जितना करती है उसका कोई मूल्य नहीं वो बिना मेहनताना के ये सब करती है और बदले में हमसे प्यार और सम्मान की अपेक्षा रखती है। आज जिस शक्ति और शरीर पे हम घमंड करते हैं वो उसी स्त्री का दिया हुआ है। पिता तो सिर्फ प्राण और चेतना देता है जो अदृश्य है हमारे दृश्य या ठोस रूप की रचना तो माता से होती है और संतान को पालने में कितना मेहनत करती है ये बताने की जरूरत नहीं है क्योंकि ये तो सभी देख रहे हैं प्रत्यक्ष और भुगत भी रहे हैं। स्त्री नहीं हो तो हम कहाँ से होंगे हमारा अस्तित्व कहाँ होगा कम से कम इस विषय में तो लोगों को सोचना चाहिए। नाड़ी अगर वेश्या बनी तो उसको इस ओर लाने में पुरुषों का ही हाथ है अपने वासना की पूर्ति के लिए हम स्त्री को इस्तेमाल करने लगे, हम अपनी वासना के लिए दूसरे की पत्नी, माँ, बेटी, बहन को अपने बिस्तर पर देखना पसंद करने लगे और इसके कारण इस समाज मे एक बहुत बड़ी समस्या का आगमन हुआ, उदाहरण आज किशोर अपनी वासना के लिए अमृता के पास जाने लगा तो किशोर की पत्नी क्या करेगी अपने बच्चे का, परिवार का या अपना पेट पालने के लिए कोई काम तलाशेगी और इस पुरूष प्रधान समाज में उसे काम मिलेगा तो लेकिन 90% चांस हैं कि उसको काम देनेवाले के बिस्तर को सजाने के बाद ही, अगर राधेश्याम की बेटी और अरुण की बहन किसी पर पुरूष के साथ रिश्ते रखती है और अपने जरूरतों को पूरा करती है तो इन घटनाओं में किसकी गलती पुरुषों की ही न कि किशोर अमृता के ऊपर ध्यान देने लगा और राधेश्याम या अरुण अपनी बहन के जरूरत को पूरा नहीं कर पाया, दूसरा कि राधेश्याम या अरुण के बहन से रिश्ता रखने वाला पुरुष अपनी वासना के लिए स्त्री से उसकी इज्जत का सौदा करने लगा ।(इस उदाहरण में दिया गया नाम किसी व्यक्ति विशेष के लिए नहीं हैं ये सिर्फ उदाहरण के लिए दिखाने वाला एक काल्पनिक नाम है इससे किसी का कोई संबंध या लेना देना नहीं है)

आज के समय मे लोग स्त्रियों के चरित्र की ओर ज्यादा ऊँगली उठाते हैं, कहते हैं उसकी बेटी 5-5 लड़कों से सम्बंध रख्खी है, इसकी पत्नी उस मर्द के साथ है, अरे भाई तो उस लड़की और उसकी पत्नी से संबंध रखने वाला पुरूष ही कहाँ सही है वो पुरूष उस स्त्री से संबंध रक्खा ही क्यों, पुरूष स्त्री को नकार देगा तो स्त्री किससे सम्बन्ध रक्खेगी? स्त्रियां मजबूर होके ऐसा करती है चाहे वो कैसी भी मजबूरी हो सकती है। गंगा का पानी पवित्र था, है और रहेगा लेकिन आज लोग कहते हैं वो दूषित हो गया तो उसको दूषित किया किसने ? लांक्षण लगाने से पहले उस कार्य का मूल और कारण को देखो मूल और कारण का हल कर दोगे तो समस्या आएगी ही नहीं। लोग स्त्री के जिस स्तन को देख के काम वासना से भर जाता है वो स्तन ईश्वर ने वासना के लिए नहीं बल्कि अपने शिशु को दूध पिलाने के लिए दिया है और पुरूष वासना की शांति करते समय अपने मुँह में उसी स्तन को लेता है इसका अर्थ वो पुरूष अपनी माँ के स्तन की बेइज्जती करता है और स्तन मुँह में लेने के कारण वो स्त्री तो उसकी माँ हो गई और उसी माँ के साथ अपनी वासना शांत करता है, यानी इंसान इतना गिर गया कि उससे अच्छे तो जानवर हो गए, जानवर कम से कम अपने माँ के इस जीवन दायिनी अंग का तो सम्मान करता है।

स्त्री मन की कोमल होती है, ईश्वर ने पुरूष और स्त्री दोनों में समान भावना और समान गुण डाले हैं, बस बनावट में हम कड़े हैं और वो कोमल है, हम बर्दाश्त नहीं कर पाते उसमें बर्दास्त की अपार शक्ति होती है, स्त्री को ईश्वर पुरुषों के लिये उपहारस्वरूप भेंट किया है जिसकी रक्षा करना, सम्मान करना और सम्मान दिलाना, सब हमारा कर्तव्य और धर्म है।

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