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श्रिष्टी की रचना कैसे हुई?

श्रिष्टी अर्थात ब्रह्मांड+जीव+तत्व+वस्तुयें। जैसा कि मैंने अपने पिछले ब्लॉगों में कहा है कि ब्रह्म के एक कोने में हमारा ब्रह्मांड मटर के दाने के समान है उसके अनुसार इस पूरे ब्रह्म में असंख्य ब्रह्मांड है, ओर इस बात को नही जानने वाले आपस मे लड़ते हैं कि इस ग्रंथ में ये लिखा है तो उस ग्रंथ में ये लिखा है। हमारे हिन्दू धर्म के ग्रंथ में उल्लेख मिलता है कि लोमस ऋषि के शरीर पर जितने रोम(शरीर पर उगने वाले बाल) है उतने ब्रह्मांड हैं और अगर एक ब्रह्मांड का अंत होता है तो उनके शरीर से एक रोम गिर जाता है।

हमारे हिन्दू धर्म के ग्रंथों को देखे तो प्राणी भ्रमित भी हो जाता है, क्योंकि हर ग्रंथ के अनुसार लगता है कि यही देवता सबसे ऊपर हैं। इस बात को मैंने अपने गुरुजी के सामने उठाया था तो मेरे गुरुजी ने कहा कि ये दुनिया जंगल है इसमें तुमको आत्म रक्षा के लिए किसी पेड़ का सहारा लेना है ताकि तुम ऊँचाई पर जाने के बाद सुरक्षित रहो सो जिस पेड़ पे तुम्हारा मन लगे उसपे चढ़ जाओ, क्योंकि जाओगे तो ऊंचाई पर ही ओर तुम सुरक्षित हो जाओगे अर्थात मनुष्य को किसी भी एक देवता जिनसे उसका लगाव है उनकी भक्ति में रम जाए उसका बड़ा पर लग जायेगा।

अब इस भ्रम पैदा करने वाले तथ्य पर प्रकाश डालते हैं।

हम यहाँ रामायण का ही उदाहरण लेते हैं, रामायण कई लोगों ने लिखा जैसे, वाल्मीकि मुनि, तुलसीदास, आनंद रामायण इत्यादि, सभी में बहुत सी बातें ऐसी है जो अलग अलग है और इसपर लोग भ्रमित हो कर आपस में लड़ पड़ते हैं, इन लड़ने वाले लोगों में बहुत लोगों को एक रहस्य मालूम है लेकिन वो इसको साधारण बात या बेकार की बात मान के ध्यान नहीं देते। बात ऐसा है कि हमारे वेदों में कहा गया है कि एक कलयुग, एक त्रेतायुग, एक द्वापर, और एक सत्ययुग के बीतने पर प्रलय होता है जो एक कल्प कहलाता है और ऐसे 4 प्रलय आने के बाद माह प्रलय होता है। अब हम बात करते हैं कि लोगों में अलग अलग भ्रांति क्यों है? जैसा कि हम सभी रामायण को जानते है तो उसमें रावण के मरते समय कुछ बही हुआ था लेकिन कई लोग कहते हैं कि श्री राम ने लक्ष्मण को ज्ञान लेने भेजा था। कितनी बार सुनने में आता है कि भगवान विष्णु अपने द्वारपाल जय और विजय को श्राप से मुक्ति देने के लिए रामावतार लिए तो कहीं कहा गया है कि नारद जी ने श्राप दिया इसलिए तो कहीं और कुछ ऐसे में लोग सोचते हैं कि एक राम कितने कारणों से जन्म लेगा, और वो अपनी बात को शिद्ध करने लगते हैं जिससे ये विवाद और भ्रम पैदा होता है।

अब मुद्दे की बात पर प्रकाश डालते हैं मनुष्य जिन बातों को समझ के और सोच के आपस में लड़ता है उसे मैं क्या कहूँ मुझे समझ नहीं आता जबकि सत्य आईने के समान हमारे सामने है, ये राम से संबंधित बातों में भिन्नता है तो वो इसलिए कि ये सारी घटनाएं हुई है लेकिन अलग अलग कल्प में, जी हाँ राम एक कल्प में लक्ष्मण को भेजते हैं दूसरे में नहीं दूसरे में कुछ और होता है, तीसरे में कुछ और। एक कल्प में अपने पार्षद के उद्धार के लिए आते हैं तो दूसरे में नारद के श्राप के कारण । यानी एक महाप्रलय आने तक चार रामावतार, चार कृष्णावतार, चार कल्कि आदि अवतार हो जाते हैं और जब महाप्रलय आता है तब ये पूरा ब्रह्मांड नष्ट हो जाता है।

अब आपके मन मे ये प्रश्न हरूर आ रहा होगा कि जब सब नष्ट हो जाता है तब ये कहानी या इन घटनाओं के विषय मे कौन बताता है या इसके दस्तावेज कैसे बच जाते हैं? तो आपको ये बात याद होगा जो नैन अपने पुराने पिछले ब्लॉगों में कहा था, और वैसे भी आप सभी जानते ही हैं कि ध्वनि तरंग या मस्तिष्क का तरंग नष्ट नहीं होता, हमारे पूर्वज विद्वान इन्हीं तरंगों को सुनके वेदों एवं शास्त्रों की रचना करते हैं। इसका एक छोटा सा नमूना मैं बताता हूँ।

महर्षि पाणिनि ने भगवान शिव के डमरू के ध्वनि की सुनके संस्कृत व्याकरण की रचना की यानी उन्होंने महेशवाणी सूत्र की रचना की। इस तरह की विद्या ध्यान और तप से आता है, जो पिछले ब्लॉग में मैंने कहा था तप और ध्यान कैसे हमें संपन्न बनाता है?

जब महा प्रलय होता है तो कुछ नहीं बचता सारि श्रिष्टी एक अदृश्य शक्ति में विलीन हो जाती है, आज कल आप सभी जिसे Black Whole के नाम से जानते हैं। इस प्रक्रिया के बाद पुनः इस श्रिष्टी कि रचना का कार्य आरम्भ होता है, जैसा कि मैंने B. R. चोपड़ा का TV series माँ शक्ति में देखा तो मैंने सोचा कि इसने श्रिष्टी की रचना को सही जाना है और सही बात लोगों को बताने की कोशिश की है परंतु उसमें presentation की कमी लगी और कहानी एक दूसरे से मेल नहीं खाते जिससे लोग या तो ऊब जाते हैं या बकवास लगता है। लेकिन इसमें जो सुरूआत का concept है वो ही सत्य है।

इसने बताया है कि जो भी वस्तु दिखता है वो प्रकृति है और जो अदृश्य है वो पुरूष और इस बात को मैं अपने पिछले ब्लॉग में दूसरे तरीके से बताने का प्रयास किया था। पुरूष निराकार है, प्रकृति साकार और यहाँ मेरे पिछ्ले ब्लॉग वाली बात की इस निराकार प्रकाश पुंज में अभिक्रिया होने से एक साकार प्रकृति की उत्पत्ति होती है और इस प्रकृति के तीन गुण जो सत्व गुण- महा सरस्वती, रजोगुण- महालक्ष्मी, तमोगुण- महाकालि के रूप में इसके बाद प्रकृति और पुरुष के अभिक्रिया से एक साकार ईश्वर की उत्पत्ति होती है (हमारे वेदों में कहा गया है कि जब महा प्रलय होता है तो भगवान एक छोटे बालक के रूप में पैर के अंगुठे को अपने मुंह में रख के एक बरगद के पत्ते पर होते हैं और ऐसा ही होता भी है जब ईश्वर की उत्पत्ति होती है) जिसके तीन गुण अलग होते हैं, सत्व गुण- ब्रह्मा, रजोगुण- विष्णु, और तमोगुण- महेश हैं।

अब ये राक्षस कहाँ से आये ये ग्रह इत्यादि कैसे बने? ये प्रश्न उठ सकता है आपके मन में, तो मैं बता दूं कि जब ईश्वर से तीन गुण ब्रह्मा, विष्णु और महेश के उत्पत्ति के बाद सब अपने अपने काम करने के लिए अपने स्थान पर चले गए और ध्यान काग के अपनी कर्म के लिए ज्ञान अर्जित करने लगे तभी भगवान विष्णु के कानों की गंदगी से दो दानव का जन्म हुआ, (इस कान के गंदगी को भी मैं समझता चलू की आप सभी ये जानते हैं कि शरीर में पांच छिद्र हैं जिससे हमारे भीतर का अवशिष्ट पदार्थ बाहर निकलता है) मधु ओर कैटभ ये दोनों अति बलवान थे ये ब्रह्मलोक को अपना स्थान बनाना चाहते थे जिस कारण ये ब्रह्मा जी पर आक्रमण करने के लिए दौड़े ओर ब्रह्मा जी ने भगवान विष्णु की स्तुति करके उन्हें जगाया और भगवान विष्णु और उन दोनों दानवों के बीच पाँच हजार साल तक युद्ध चला जब हर जीत का फैसला नही हुआ तो ईश्वर ने आदि शक्ति को याद किया और उन आदिशक्ति के योग माया से मोहित होकर उन दोनों दानवों ने भगवान विष्णु से वरदान मांगने को कहा जिसपर भगवान ने उनसे उनको मृत्यु प्राप्त करने का वरदान मांगा और अपने चक्र से दोनों का सिर काट दिया, उस दानवों के सिर कटने से खून और मवाद की पिचकारी निकली जिससे इस श्रिष्टी के ठोस वस्तु बने । उन रक्षाशों के मवाद यानी मेद से ये पृथ्वी बनि है इसलिये इसे मेदिनी भी कहते हैं।

यहाँ मैं आपको बताना चाहूँगा की ये मधु ओर कैटभ क्या चीज थे क्योंकि मैं आपको अपने ब्लॉगों के द्वारा वेद और विज्ञान में समानता और आपका विश्वास जगाना चाहता हूँ। मधु यानी मीठा और कानों को मीठा आजकल क्या लगता है तो अपनी बड़ाई अपना गुणगान, कैटभ यानी कटाक्ष और कानों को बुरा क्या लगता है तो अपनी निंदा ओर इन दोनों से प्राणी के अंदर अहंकार की उत्पत्ति होती है तो जब भगवान विष्णु जप करके अपनी क्षमता बढा रहे थे तो उनके शरीर से ये दो विकार अलग हो रहे थे और आपको मैन पहले ही बताया है कि तप और ध्यान से हमारी शुद्धि होती है हमारा तेज निखरता है, और इन्हीं दो विकारो के राख से इस श्रिष्टी के सभी ठोस वस्तु बने हैं।

○तो आपका संदेह खत्म हो गया होगा कि विष्णु जब एक गुण है तो गुण के कान में गंदगी कहाँ से आई? ये मधु और कैटभ भी गुण ही है, निंदा और स्तुति। इनके भस्म से इस श्रिष्टी के ठोस वस्तु यानी पृथ्वी, सुर्य, तारे, ग्रह, छुद्र ग्रह इत्यादि सब की रचना हुई है जिसे ईश्वर ने मनुष्यों के रहने के लिए स्थान बनाया। अब बारी थी मनुष्य के उत्पत्ति की जब ब्रह्मा जी ने मनुष्य की उत्पत्ति करनी शुरू की तो वो सिर्फ नर को जी उत्पन्न करते थे और उससे श्रिष्टी को आगे बढ़ाने को कहते परन्तु वो मनुष्य पूर्ण होता था उसमें किसी प्रकार की कोई कमी या लालसा नही होती थी जिससे वो श्रिष्टी के कार्य में योगदान नहीं करता और अपने लक्ष्य की प्राप्ति में लग जाता जैसे नारद मुनि, सनकादि ऋषि, जब श्रिष्टी की रचना का कार्य सफल नहीं हो रहा था तब पुनः ब्रह्मा जी ने तप कर आदिशक्ति को प्रसन्न किया फिर आदिशक्ति ने उनकी रचना में त्रुटी को बताया और कहा कि जबतक किसी के अंदर किसी वस्तु की कामना न हो लालसा न हो तबतक वह कोई कार्य नहीं करेगा और आप अभी तक जितने रचना किये सभी पूर्ण थे इसीकारण वे श्रिष्टी के कार्य मे रुचि नहीं लिए। इसके वाद ब्रह्मा जी ने नर की रचना की परंतु स्त्रि तत्त्व के बिना जिससे पुरूष अधूरा हो गया और अपने को पूर्ण करने के लिए वो कर्म करने लगा इसके बाद ब्रह्मा जी ने स्त्री की रचना की, वो भी अधूरी थी और वो भी अपने आप को पुर्ण करने के लिए कर्म करने लगी और श्रिष्टी की रचना के कार्य में प्रगति हुई, चुकी ये श्रिष्टी आदिशक्ति के प्रेरणा और उनके इच्छा अनुसार बना इसलिए इस श्रिष्टी में शक्ति का नाम पहले आता है, जैसे, गौरि-गणेश, सीताराम, लक्ष्मीनारायण, राधा कृष्ण, उमा महेश, गौरीशंकर इत्यादि।

साधारण मनुष्य के नाम में भी पहले शक्ति ही आती है, वो ऐसे की हर मनुष्य अंग्रेजी में अपना नाम Mr. ओर हिंदी में श्री से शुरू करता है और श्री का मतलब सौभाग्य से होता है जो शक्ति का परिचायक है।

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