TatwaBodhani ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते | पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवा वशिष्यते ||

मंत्र क्या है? इसका प्रभाव हमारे ऊपर कैसे पड़ता है?

हमारे प्रिये पाठक आज हम आपको मंत्र के विषय में बताने जा रहा हैं, की मंत्रों का क्या रहस्य है? यह है क्या ?

आपने कई बार सुना होगा कि पंडित जी मंत्रों का जप करके ये किया या वो किया, साथ ही नेट पे या tv पर भी बताया जाता है कि महामृत्युंजय के जप से दुख दूर होते हैं, गायत्री के जप से तेज आता है, श्राप कटता है, लेकिन कैसे? अगर बोलने से ही काम हो जाता तो आज कोई दुखी ही नहीं होता, ना जाने हम कितनो को अच्छा बोलते हैं कितनों को बुरा बोलते हैं वो सब हो जाता, लेकिन ऐसा नहीं होता तो मंत्रो से कैसे होता है? आज कल मंत्रों के जप करने पर भी काम नहीं होता क्यों? इस बात पे ध्यान देने की जरूरत है, जबकि पहले के समय मे यही मंत्र काम करते थे, इन्ही सब कारणों से आज के लोग पंडित, पूजा, मंत्र आदी पे कम विश्वास करने लगे हैं ।

आज मैं आपको बताता हूँ कि कारण क्या है? आज हम एक उदाहरण लेते हैं जैसे किसी के पास सबसे उन्न्त किस्म का तकनिक है, और हमें वो चाहिए और हमने उस व्यक्ति से उस तकनिक को खरीदने के लिए समझौता किये लेकिन उसने original ना देके हमें dummy दे दिया, हम उस dummy को original मान के चल रहे हैं, यही बात यहाँ भी मंत्रो के साथ है, इसमे गलती किसी की नहीं है, कयोंकि सामने वाले को शास्त्रों की पाबंदी है जिस कारण वो सबको सही चीज दे भी नहीं सकता, क्योंकि इसका दुरुपयोग भी हो सकता है और इन बड़े मंत्रों का कोई उपचार नहीं है, अगर कोई इसका गलत इस्तेमाल करे तो ।

आज मंत्रों का वही हाल है जैसे बिना क्रिम का दूध, और इन मंत्रों का यही हाल है।

अब मैं आपको बताता हूँ कि बात क्या है?

असल में आज जो भी मंत्र हमारे सामने आते हैं उनमें से उनका असली तत्व हटा हुआ रहता है, कोई भी मंत्र तभी काम करता है जब वो सम्पुटित हो, सम्पुटित का मतलब है कि किसी भी मंत्र के पहले और बाद में किसी मंत्र शब्द से लॉक करते हैं, उस शब्द मंत्र को आप कवच भी कह सकते है, ये ठीक वैसे ही है जैसे सुरक्षा गार्ड पहनना ।
वो शब्द मंत्र आपको नहीं मालूम होती और आप एक उम्मीद के साथ गलत मंत्र का जप करते जाते हैं।

दूसरा की हर मंत्र और पाठ करने से पहले न्यास और श्राप विमोचन किया जाता है जो आप नहीं करते।

अब आपके मन में ये प्रश्न आ रहा होगा कि ये श्राप विमोचन क्या है तो आपको बता दूं कि बहोत से ऐसे मंत्र और पाठ हैं जो श्रापित हैं, कलयुग की भविष्यवाणी को जानते हुए हमारे ऋषि मुनि उन मंत्रो को श्रापित कर दिया ताकि गंदे और बुरे लोग इसका उपयोग ना कर सके, क्योंकि ये मंत्र और पाठ बहुत प्रभावी हैं जो आसानी से थोड़े से मेहनत में ही फल देते हैं और कुछ बहुत ही खतरनाक हैं जिनके खतरे को रोकने के लिए उसे श्रापित कर दिया गया।

तीसरा है नियम हर तरह के मंत्र और पाठ का अपना विधान और नियम हैं जो आप नहीं कर पाते, एक छोटा सा उदाहरण हम लेते हैं जब आप खाना बनाते हैं तो क्या हर dish का एक ही तरीका और एक ही मसाला होता है ? नहीं , जबकि वो खाना आपको पेट भरने के लिए ही खाना है, क्या नॉकरी पाने के लिए एक ही तरह का काम करना पड़ता है? नहीं, ठीक इसी प्रकार हर मंत्र और पाठ का पूजा अलग अलग विधान है,

अब विधान के विषय में बताता हूँ , तब बाद में मंत्र के विषय में बताऊंगा।

आज कल लोग पूजा के विधि विधान पे ध्यान नहीं देते लोग को जो अच्छा लगता है वही करते हैं, और आज कल के पंडित जी भी वैसे ही हैं वो भी सोचते हैं चल भाई जिसमे यजमान खुश रहे, नहीं तो ज्यादा नियम बताऊंगा तो अगली बार से मुझे नहीं बुलायेगा मेरी रोजी रोटी मारी जायेगी। तो फिर आप उस पूजा से किसी फल की कामना कैसे कर सकते हैं, जब हम दूध के जगह सफेद पानी, चीनी के जगह कोई मीठा फल, और चावल के जगह कुछ दूसरा अनाज डालेंगे तो हम खीर की कामना नहीं कर सकते न। मैं जब ज्योतिष विद्या की पढ़ाई कर रहा था तो मैं अपने गुरु जी के साथ एक महामृत्युंजय के जप के अनुष्ठान में गया, वहाँ एक बहुत ही बिमार आदमी के लिए सवालाख मंत्र का जप 11 दिन में करना था, और मैन देखा कि वो आदमी जिसको डॉक्टर ने जवाब दे दिया था 11वें दिन हमारे साथ हवन किया।

इसमे चमत्कार कुछ नहीं है बस समझ का फेर है, हमारे सभी जप, पूजा, पाठ आदि में जो नियम और विधान बताये गए हैं वो सभी विज्ञान ही है और विज्ञान पर ही आधारित है, विज्ञान आज जिस चीज को खोज रही है वो हमारे शास्त्रों में हजारों साल पहले कहा जा चुका है,

अब मैं बताता हूं कि वो व्यक्ति 11 वें दिन कैसे ठीक हुआ?

हुआ ऐसा की गुरु जी ने जितने और जो जो सामान बताया था उनके घर के लोगों ने वो सब उपलब्ध कराया था ऐसा कुछ नहीं था जो ना हो और किसी सामान के बदले कुछ और आ गया हो, अब हम सारे पंडित और जो पति पत्नी पूजा पे हमारे साथ बैठे थे वो सभी पूरे दिन में 3 बार फलाहार लेते थे, और पूरे दिन धूमन, गुग्गुल, तिल के तेल का दीपक जलाते थे और आप सभी जानते हैं कि हवा में कई तरह के बीमारी वाले जीव भी रहते हैं और सुगंध पर वो सभी नष्ट हो जाते हैं तो उस बीमार आदमी के घर की हवा में भी 11 दिन यही हुआ, जिससे नए जीव उसके ऊपर घात नहीं कर सके, उसके बाद शाम में उसको हम अष्टधातु वाला जल जिसमें, गोमूत्र, तुलसी, गंगाजल मिला रहता था वो पिलाते थे, और यहाँ भी आप जानते हैं कि अष्टधातु में रखा जल जिसमे ताम्बा, चाँदी आदि का अंश आ जाता था और गंगाजल, गोमूत्र, तुलसी सभी अंदर के जीवाणु को नष्ट कर रहे थे, खाना में हमारे साथ साथ सभी सात्विक भोजन करते थे जिसमें कुछ ऐसा था ही नहीं जो शरीर को नुकसान करे तो उस व्यक्ति को ठीक होना ही था

अब मैं असली राज की बात आपको बताता हूँ, उस आदमी को ठीक होने में ये विधान सब तो साहयक थे लेकिन सही मायने में असली दवा तो मंत्र थे जो उस जप में और पूजा में उपयोग हो रहे थे ।

वो कैसे?

Simple है यहां भी विज्ञान है, जैसा कि हम सभी जानते हैं आवाज के कम्पन से बहुत से काम हो सकते हैं और इस पूरे ब्रह्मांड में ही आवाज का कम्पन काम करता है तो बस वही है यहां भी, हमारे शास्त्रों में कई तरह के छन्दों का जिक्र है जैसे अनुष्टुप छंद, त्रिष्टुप छंद, गायत्री छंद और भी बहुत, तो सारा खेल इसी छंद में है, हर मंत्र, हर पाठ, हर स्तुति का अपना छंद और श्वर हैं।

आप में से बहुत से ऐसे होंगे जो योगा करते होंगे तो आप जानते होंगे कि भ्रामरी प्राणायाम क्या होता है और इससे क्या फायदा है, भ्रामरी प्राणायाम में शरीर के भीतर आवाज द्वारा कम्पन पैदा किया जाता है जिससे हमारे शरीर के विकार नष्ट होते हैं, अच्छा छोड़िए दैनिक जीवन में देखिए किसी चीज पर से धूल या जंग हटाने के लिए आप कम्पन ही पैदा करते हैं और कम्पन द्वारा साफ किया गया वस्तु काफी ज्यादा साफ हो जाता है साधारण तरीकों के अपेक्षा । आप जब किसी शोर शराबा वाली जगह पे होते हैं तो ज्यादा आवाज के कारण आपका मन परेशान हो जाता है, कभी कभी आप अपने अंदर कम्पन भी महशुस करते होंगे । इसी प्रकार मंत्रो, स्तुतियों और पाठों से कम्पन किया जाता है, पहले जो भी पूजा पाठ के नियम ये सब किसी न किसी चीज की कामना से होता था और लोगों की आस्था होती थी, लेकिन आज लोगों को ये सब बेकार और फालतू की लगती है, और जिनकी श्रद्धा इसमे है वो अपने अनुसार काम करता है और सिद्धि ना मिलने पे इन सबको ढोंग बताते हैं।

आज लोग मुँह से स्तुति या पाठ या मंत्र या आरती बोलने के जगह लोग device से काम चला लेते हैं, वो भी सही रहता लेकिन वो तो business के उद्देश्य से बनाया गया होता है जिसमे "जो सुनने में कानों को प्रिये लगे उस लय और ताल पे बनाया होता है" तो आपको उससे फायदा क्या मिलेगा, लोग अपने मुँह से बोलते हैं तो हमारे शरीर का विकार बाहर निकलता है जो आज खत्म हो गया है, पंडित सब भी समझ गया कि लोगों को यही पसंद है तो वो भी लोगों के अनुसार ही काम करते हैं और अपने आनेवाले संतानो को इन सबसे दूर रखते हैं क्योंकि लोग पंडितो को नीची दृष्टि से देखने लगे हैं, जबकि लोग ये नहीं देख रहे की हम अपनी सुविधा के लिए पंडित को ठीक से काम नहीं करने देते।

आज अच्छे पढ़े लिखे पंडित इस पूजा पाठ के काम मे नही हैं, वो या तो किसी सरकारी नॉकरी या किसी कॉलेज में या research में हैं, आज जो भी पंडित हैं उनमें से 80% पढ़े लिखे नहीं होते यानी वेद या शास्त्र का ज्ञान नहीं होता उन्हें, तो फिर आप समझ ही सकते हैं।

जैसे शिवताण्डवस्रोत्र रावण ने बनाया और रावण वीर था जो इस स्रोत्र में वीर रस डाला और ये वीर रस में ही गाने से अपना फल देगा ना कि बाहुबलि फ़िल्म के गाने को बजाने से। इस पर हम ओर चर्चा अपने अगले ब्लॉग में करेंगे।


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