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परमात्मा का क्या रहस्य है?

जैसे मैने अपने मुक्ति वाले ब्लॉग में कहा था कि परमात्मा एक दूधिया प्रकाश का समूह है और इसी में हमारा ब्रह्माण्ड है एवं उसी परमात्मा का छोटा सा कण आत्मा है ।

अब मैं आप सभी को परमात्मा के विषय मे बताना चाहता हूँ । इस दूधिया प्रकाश में निरंतर क्रिया होती है और उस क्रिया के परिणाम तीन गुणों के रूप में मिलते हैं जिसे सत्व गुण= ब्रह्मा, रज गुण = विष्णु और तमो गुण = शिव कहते हैं । ये तीनों गुण इस सृष्टि को संचालित करते हैं।  इसी में इन तीनों के अलावा शक्ति और बुराई की भी उत्पत्ति होती है ।

Parmatma मैं एक या दो उदाहरण के द्वारा आपको समझता हूँ, आप गाड़ी तो चलते हैं अगर नहीं तो उसके विषय मे अच्छे से जानते तो होंगे, गाड़ी चलाने के लिए हम पेट्रोल डालते हैं वो पेट्रोल जब टूटता है तो उससे 1- ऊर्जा, 2- कार्बन, 3- ऊष्मा, और 4- जला हुआ अवशेष निकलता है जो धुआँ होता है । इसी नियम से जब उस प्रकाश पुंज में क्रिया होती है तो जो शक्ति और ऊष्मा के रूप में निकलता है वो त्रिदेव ब्रह्मा, विष्णु और शिव हैं जो जला हुआ अवशेष है वो तत्व आदि हैं और जो कार्बन है वो बुराई है।

दूसरा उदाहरण - आप आग जलाइए और उससे आपको क्या मिलता है इसको देखिये कैसे आग जलने पर हमें ऊष्मा, कार्बन और अवशेष मिलता है।

इस पूरी श्रिष्टी में क्रिया एक ही नियम से होता है जैसे मनुष्य के शरीर में भोजन के जलने से ऊर्जा, मल और चर्वी का निर्माण होता है। इस पूरे श्रिष्टी का दो से तीन नियम है और इसी पर सब आधारित है तत्काल आपको यह नियम भिन्न लगेगा लेकिन गौर से इसको देखियेगा और गहराई तक सोचियेगा तो सच्चाई आपको खुद मालूम हो जाएगा।

इस श्रिष्टी के सारे वस्तु वो सजीव हो या निर्जीव, चर हो या स्थिर, ये सभी परमात्मा का ही अंश है।

Parmatma अब इस नियम को एक वैज्ञानिक दृष्टि से देखते हैं और परमात्मा एवं श्रिष्टी के रहस्य को समझने की कोशिश करते हैं। मान लीजिये की ब्रह्मा= इलेक्ट्रॉन, विष्णु= प्रोटॉन एवं शिव= न्यूट्रॉन । अब आप सभी जानते हैं कि गतिशील इलेक्ट्रॉन होता है और किसी चीज से वही पहले अभिक्रिया करता है और एक अलग परिस्थिति या वस्तु का निर्माण करता है, यही काम ब्रह्मा करता है यानी निर्माण का कार्य। अब प्रोटॉन उस परिस्थिति या वस्तु को पोषित कर स्थिरता या उद्देस्य प्रदान करता है, ये काम विष्णु करता है। न्यूट्रॉन स्थिर यानी निष्क्रिय बना रहता है और परिस्थिति या वस्तु इस केंद्र विंदु तक आकरके अपनी निर्माण और पोषण के पूर्णता को प्राप्त करता है और क्रिया का अंत होता है परिणाम स्वरूप आपको एक नई वस्तु या परिस्थिति की प्राप्ति होती है ठीक ऐसे ही शिव तक आते आते सभी वस्तु अपनी पूर्णता को प्राप्त हो जाता है और परिणाम स्वरूप हमारे कर्म इस प्रकृति या परमात्मा को प्राप्त होते हैं।

इसीलिए हिन्दू वेदों में कहा गया है कि इस सृष्टि में अनगिनत ब्रह्मांड हैं। और हर ब्रह्मांड का जन्म और अंत होता है और ये आप अपने आस पास के वातावरण से उदाहरण ले सकते हैं

अब ये त्रिदेवी क्या हैं? ये सवाल जरूर आपके मन मे आते होंगें तो आइए इसपर भी नज़र डालते हैं।

Parmatma हर व्यक्ति या वस्तु की समय या परिस्थिति वस अपनी शक्ति होती है जिसके द्वारा वह अपना प्रभाव डालता है, वैसे भी सभी इलेक्ट्रान तो गतिशील होते हैं तो ऐसा भी कुछ चाहिए जिसके द्वारा वह किसी दूसरे वस्तु से अभिक्रिया कर सके क्योंकि अभिक्रिया के बाद भी इलेक्ट्रॉन गतिशील ही रहेगा तो परिणाम स्वरूप जो प्राप्त होगा वह बिखर जाएगा या स्थिर नहीं रहेगा तो इस स्थिरता को बनाये रखने में प्रोटॉन ओर न्यूट्रॉन सहायता करता है और बिल्कुल यही नियम यहाँ भी है अर्थात सरस्वती, लक्ष्मी और गौरी इन गुणों के स्थिर भाग हैं। जैसा कि मैंने पहले कहा है कि ब्रह्मा कर्म है रचना की प्रक्रिया है तो कर्म करने में सहायक विद्या यानी ज्ञान होता है इसीलिए इसे सरस्वती कहा गया है यानी ज्ञान की देवी कहा गया है।
लक्ष्मी- विष्णु यानी रजो गुण का काम पालन है और पालन करने के कार्य में जो गुण काम आता है वो गुण ही लक्ष्मी है और इसी के प्रेरणा स्वरूप हम पालन के लिए आवश्यक सभी वस्तुओं को प्राप्त करते हैं, यहाँ मेरी सोच कुछ अलग है जो हमारे हिन्दू धर्म और हिंदुस्तान में लोगो को पसंद न आये, आप जो पालन का कार्य करते हैं इस कार्य में आवश्यक सभी वस्तुओं को प्राप्त करने को लक्ष्मी कहते हैं ना कि धन को। इस बात को ऐसे समझिये कोई व्यक्ति बहुत गरीब है उसके पास न तो घर है, न कपड़े हैं और न ही भोजन तो लोग क्या कहते हैं इससे लक्ष्मी रुठ गई हैं, लोग अक्सर कहते हैं कि आलसी लोग के पास लक्ष्मी नहीं है अर्थात वो आलसी व्यक्ति काम करेगा तब उसके पास लक्ष्मी यानी धन होगा, उस भूखे और नंगे के पास कुछ नहीं है  क्योंकि वो दिमाग से काम न लेके, अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए प्रयास नहीं कर रहा, तभी उसके पास लक्ष्मी नहीं है , अगर वो प्रयास करे तो लक्ष्मी होगी उसके पास, चाहे वो कोई देश हो या व्यक्ति।

तो इससे ये साबित हो गया कि लक्ष्मी धन नहीं बल्कि धन प्राप्त करने का प्रयास है।

गौरी- इसमे भी यही बात है शिव का कार्य नष्ट करना है, और नष्ट करने की क्रिया ही गौरी है, जैसे विष लोगों को मार सकता है तो वो मारने की प्रक्रिया ही गौरी है, इसे ऐसे समझिये आपने अपनी जिंदगी में देखा होगा कि जिस व्यक्ति को लोग सबसे कमजोर समझते हैं शरीर से वो इतना पतला है कि तेज हवा आये तो लगता है वो उड़ जाएगा लेकिन वो भी एक अच्छे लड़ाका पे भारी पड़ता है कारण यही है। अब यहाँ एक विचार आपके मन में जरूर आ रहा होगा कि किसी में ये कार्य करने की प्रक्रिया कैसे ज्यादा और कम होता हैं? तो मैं आपको बता दूं ये सब आपके आस पास की घटना के जैसे ही है, जैसे कोई वस्तु खुद से किसी प्रकार टुटता है तो वह अलग अलग आकार और भार में टुटता है बराबर बराबर भाग में नहीं, कोई टुकड़ा बड़ा होता है, कोई छोटा तो कोई नजर भी नहीं आता ठीक ऐसे ही इस प्रकाश पुंज रूपी परमात्मा में अभिक्रिया और प्रतिक्रिया की वजह से जब विखंडन होता है तो वह भी अलग अलग होते हैं जिससे ऐसा होता है और सभी में गुणों की मात्रा अलग अलग होती है।

वैसे एक और तरह से आप इन त्रिदेव और त्रिदेवी को समझ सकते है, सुनने में ये अलग लगेगा लेकिन गहराई से देखने पर यह भी पहले वाले नियम का ही पालन करता है।

इस श्रिष्टी में सभी चीज चाहे वो ईश्वर निर्मीत हो या मनुष्यों द्वारा सभी एक ही नियम का पालन करते हैं। तो हम त्रिदेव और त्रिदेवी के दूसरे तरीके पे बात करते हैं।

Parmatma इस श्रिष्टी में दो का ही अस्तित्व है 1- प्रकृति और 2- पुरुष

प्रकृति को तो हम जानते है और देखते हैं लेकिन पुरुष को नहीं देखते तो आप अपने किसी डिजीटल डिवाइस को देखिए जैसे computer इसमें monitor, keyboard, cpu, ups, mouse ये सभी प्रकृति है और इसमें sotware पुरुष, ठीक वैसे ही हमारा शरीर पांच तत्वों से बना है जो प्रकृति है और हमारा आत्मा पुरुष। ये दोनों एक दूसरे से अलग नहीं हैं दोनों एक दूसरे के बिना अधूरा है जैसे भगवान शिव में से स्त्री तत्व यानी स्त्रीलिंग=इ हटा दी तो क्या बनेगा? शिव-इ= शव, और शव का अर्थ है लाश, यानी कुछ नहीं 0।

अब परमात्मा के इन नियमों के विषय मे पढ़ के आपको फालतू लगे या कोई प्रश्न उठे उससे पहले मैं एक और बात  बताना चाहता हूँ कि परमात्मा में तो एक ही तत्त्व है तो ये आपस में अभिक्रिया करके अलग अलग तत्वो में कैसे आ जाता है तो आप अपने आस पास देखिये किसी चीज की अधिक मात्रा हो जाने से और काफी दिनों से लगे रहने के कारण उसके मूल रूप में बदलाव आता है ना वही बात है वैसे भी किसी भी अभिक्रिया में कुछ न कुछ परिणाम आता ही है , जैसे चीनी के दाने को ही लीजिए जा इनको आपस में घर्षण करेंगे तो हमें इसका धूल प्राप्त होगा और वह अपने मूल रूप के जैसा मीठा नहीं होगा। इन्हीं सब तरीकों को देख के आप परमात्मा के बहुत से रहस्यों को सुलझा सकते हैं, विशेष के लिए आप हमारा ब्लॉग पढ़ते रहिये।


आप अपने मन मे उठ रहे किसी भी प्रश्न को हमसे साझा कर सकते हैं हम आपके प्रश्नों का उत्तर ईमेल के माध्यम से भेज देंगे तथा उसे अपने इस ब्लॉग पे प्रकाशित करेंगे। हमारा ईमेल- tatwabodhini@gmail. com,
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