TatwaBodhani ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते | पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवा वशिष्यते ||

धर्म और रिवाजों के प्रति उदासीनता क्यो?

आज के समय में लोगों का अपने धर्म और रीति रिवाजों के प्रति उदासीनता आम बात हैं लोगों को कहते हुए सुना गया है कि ये रीति रिवाज हमें नहीं करना इसमे मैं परेशानी महसूस करता हूँ, या मेरे पास इतना समय नहीं है, या मैं इतनी देर तक नहीं बैठ पाऊँगा मुझे दर्द होने लगता है, या अरे यार ये फालतू का काम है मैं नहीं करता ये सब इत्यादि । बहुत लोग तो ये भी कहते हैं, अरे ये सब ढोंग है, ये पंडितों के द्वारा ठगा जाना है इत्यादी।

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बिल्कुल सही सोचते हैं लोग क्योंकि आज के समय में सभी कर्म या वस्तु सिर्फ एक रोजगार बन कर रह गया है, जैसे शिक्षा को ही लीजिए बच्चों को पढ़ाया कम, खर्चे का बिल ज्यादा दिया जाता है। आज सही ज्ञान के जगह लोग नंबर के लिए बच्चों को पढ़ाते हैं वही महात्मा जी का तोता बनाने के लिये। लेकिन इस परिस्थिति के लिये मनुष्य खुद जिम्मेदार है। मैंने एक बात को गौर किया है इस दुनियां में, आपने किया? नहीं किया तो अब कर लीजिए, पहले के समय के लोग अभी के लोगों के तुलना में slow थे तो उनकी आयु भी ज्यादा थी यानी उनका जीवन slow गति से अपनी अंतिम पड़ाव के तरफ जाती थी जिस कारण वो लंबी आयु तक जीते थे आज लोग जितना तेज चलना चाहते हैं उतना ही कम जीने लगे हैं साथ मे देखिये की शरीर की बनावट भी आधि हो गई है पहले के लोगों का शरीर काफी लंबा और चौड़ा था हम उनके सामने बौने लगेंगे। तो ये सारा किया धरा मनुष्य का अपना ही है।

पूजा पाठ और धर्म कर्म में भी आप अपने जल्दबाजी और आराम के कारण पंडितों को अपना काम सही से करने कहाँ दिए? वैसे इन सब की सुरूआत का मूल कारण लोभ है। मैंने अपने जीवन में ये अनुभव किया है। मैन भी वैसा ही किया जैसा यजमान चाहते थे।

लोभ कैसे है कारण? आइये बात करते हैं। आज के समय में धन का महत्त्व बहुत ज्यादा है वैसे हम ये भी कह सकते हैं कि कलयुग में सबकुछ धन ही है या यूं कहें कि मनुष्य धन को ही सबकुछ मान चुका है और यही धन है सभी फसाद की जड़।

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इस युग में पंडित और यजमान दोनों धन के पीछे भागने लगे हैं और विद्या से दुर हो चुके हैं। अब एक उदाहरण के रूप में कहानी बताता हूँ - काफी समय पहले मनका पूरी नाम का नगर था वहाँ एक ज्ञानसागर नाम का पंडित रहता था, उस नगर का सेनापति था वीरभद्र सिंह, वहाँ का राजा जैनेन्द्र सिंह था और राजा की पत्नी सुंदरता में अद्वितिय थी उनका एक पुत्र था सत्यव्रत जो सिर्फ 5 साल का था। सब उस राज्य में मजे में थे किसी चीज की कमी नहीं थी परंतु सेनापति असंतुष्ट था क्योंकि उसकी नजर उस राज्य के सिंघासन और रानी पर थी, संयोग से राजा अकाल मृत्यु को प्राप्त हुआ और चल बसा, अब मनकापुर बिना राजा का हो गया, सेनापति के लिए ये अवसर मानो बिन बादल बरसात हो गई वह अपने को राजा बनाने और रानी को पाने के प्रयास में लग गया , लेकिन पहले के समय में राजा का सलाहकार पंडित हुआ करते थे सो सेनापति को ये करने से रोक रहे थे अब सारे सभासदों ने राजकुमार सत्यव्रत को राजा बनाने के लिए उसकी राज्याभिषेक की तैयारी करने लगे अब सेनापति को कुछ और समय चाहिए ताकि वो लोगों को अपने पक्ष में कर सके और इसके लिए वो राजपुरोहित के पास गया और उनसे बोला कि आप कैसे भी करके राज्याभिषेक को आगे बढाइये और बदले में मैं आपको अपना सलाहकार बनाऊंगा और बहुत सारा धन दूँगा और पंडित जी मान गए। तो इस कहानी में देखा आपने की किस तरह एक व्यक्ति अपनी लालसा पूरी करने के लिए धन और पद का दुरुपयोग करता है तथा दूसरा उस धन और पद के लोभ में गलत काम करता हैं। आजकल लोग पंडित को पैसे दे देते हैं और कहते पंडित जी कुंडली मिला देना, पंडित जी तिथी मेरे हिसाब से निकाल दो इत्यादि। अब लोग अपने अनुसार काम तो करवा लेते हैं और कर देते हैं लेकिन इसका परिणाम उनको भुगतना पड़ता है और इस बात को वो समझ नहीं पाते कैसे, क्या और किस तरह परिणाम भुगतना पड़ता है ये मैं आपको अपने अगले ब्लॉग "भगवान या ईश्वर का अस्तित्व है" में बताऊंगा।

ये सब तो हो गया कि कमी कहाँ है लेकिन अब मैं आपको बताता हूं कि लोगों को ये धर्म कर्म झूठ क्यों लगता है? क्यों किसी को इससे लाभ मिलता है और कोई इसे फरेब कहते हैं? जैसा कि मैंने अपने पिछले ब्लॉग "मंत्र क्या है "में कहा था कि मंत्र का अपना लय होता हैं छन्द होता है और उस लय और छ्न्द पे मंत्र का उच्चारण होगा तभी मंत्र काम करेगा और पूजा कर्म में उस कामना के अनुसार पूजन व हवन सामग्री होगी तभी वह फलित होगा अन्यथा फरेब ही लगेगा। जैसा कि मैंने पहले कहा है लोग आज धन को ही सब कुछ मानते हैं तो स्वाभाविक है पैसे खर्च होंगे और उससे कुछ न मिले तो लोग कहेंगे ही मेरा पैसा गया। तो ऐसा क्यों होता है कि सबको इसका फल नहीं मिलता? चलिए मैं बताता हूं और आप भी इसपर ध्यान देंगे अपने चारो तरफ के लोगों और वातावरण पे, होता ऐसा इसलिए है की पंडित और यजमान दोनों में ज्ञान की कमी। आज के समय में संस्कृत विद्या से पढ़ने वाले लोगों की कमी हो गई है समय ऐसा हो गया है कि संस्कृत महाविद्यालय और विश्वविद्यालयों को अपनी मान्यता बनाये रखने के लिए भी विद्यार्थी जल्दी नहीं मिल रहे ऐसे में गरीब तबके के लोग अपने बच्चों को इस विद्या में डालते हैं जिनका पहला निसाना होता है कि वो पैसे कैसे कमाये ? आज इन महाविद्यालय सब मे छात्रों की कमी के कारण पंडितों की कमी है परिणाम स्वरूप जो छात्र अभी इन विद्यालयों में महाविद्यालयों में पढ़ रहे हैं उनसे पूजा करवा रहे हैं और वे छात्र पैसे के लिए सिर्फ नाम का पढ़ाई करते हैं उनको पूजा पाठ करवाने का थोड़ा सा ज्ञान हो गया और बस अब उनको विद्या के सही ज्ञान से कोई लेना देना नहीं होता और उन छात्रों को पास करना इन संस्थाओं की मजबुरी है क्योंकि उनको मान्यता बचानी है जिस कारण वे भी उसी के अनुरूप परीक्षाओं में प्रश्न पूछते हैं। आप सभी जानते हैं कि जबतक आप किसी चीज में रुचि नहीं रखेंगें तबतक आपको उस विद्या का सही ज्ञान नहीं मिल पायेगा और आज सबकी रुचि धन में है इसलिए ज्ञान की कमी है।

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दूसरा पहलु की आज के समय में जो सबसे बेकार छात्र या गाँव के जो मूर्ख लोग हैं वो किसी पंडित का सहायक का काम करके या उनसे सम्पर्क करके पूजा पाठ के विषय मे सिख लेते हैं और पंडित बनके पूजा पाठ करवाने लगते हैं, लोग भी इनको ज्यादा ही महत्व दे देते हैं। क्योंकि उनसे पूजा करने में कम खर्च लगता है काम दक्षिणा देना पड़ता है।

आज सभी लोग भौतिक सुख और भौतिक दुनिया के पीछे जा रहे हैं और इस कारण लोग दुखी भी हैं, लोगों के दुख का यह भी एक बहुत बड़ा कारण है। आप अपने आस पास नज़र उठा के देखिये की जो लोग अपने पुस्तैनी कार्यों को कर रहें हैं वो सुखी भी हैं और वो कभी भूखे नहीं रहते, वो आगे भी बढ़े हैं।

ये तो पंडितों की कहानी थी अब साधारण लोगों की बात करते हैं। पहले के समय मे पंडितों के अलावा साधारण लोग भी थे जो ये मंत्र तंत्र सब जानते थे लेकिन पूजा पाठ का काम नहीं करते थे इसी कारण वो लोग पंडितों को नियम के अनुसार पूरा समय देते थे और कम जानकार पंडितों से ये कर्म नहीं करवाते थे। वे पंडितों के साथ साथ खुद भी मंत्र और क्रिया करते थे, आज भी कुछ बड़े बूढ़े ऐसे हैं बचे हुए। लेकिन आज लोग पैसे कमाने और भौतिक सुख को पाने के लिए इतने लालायित हैं कि ये कर्मकाण्ड उनको फालतू का काम लगता है, इन कार्यों में लगने वाला समय इनको समय बर्बाद करना लगता है। आज लोग इन कर्मों को बस पुस्तैनी निसानी की तरह ढो रहे हैं और कुछ नहीं। लोग आज कर्म कम दिखावा ज्यादा करते हैं, आप अपने आस पास ही देख लीजिए अगर किसी के यहाँ सत्यनारायण भगवान की कथा होती है तो लोग पूजा और कथा के सामग्री का उतना व्यवस्था नहीं करते जितना पार्टी की जिनको न्योता भी दिया जाता कथा सुनने का वो भी कथा खत्म होने के बाद ही आते हैं सिर्फ खाने के समय पर, लोग कथा सुनना फालतू का और आलस्य का काम समझते हैं, आप देखिए की लोग जागरण करवाते हैं तो उसमें भी खाना सबसे पहले है और उसके बाद भक्ति नहीं मनोरंजन है, आप गौर कीजिए कि क्या एक भी गाना भक्ति रस या प्रेम रस से भरा है? किसी भी क्रिया में भाव है? नहीं, लोग इसको अपने मनोरंजन के अनुसार ढाल चुके हैं, भजन और संकीर्तन की जगह फिल्मी गाने का लय और ताल ने ले लिया है।

इन सब का कारण यह है कि लोग क्षणिक और भौतिक शुख को प्राथमिक और सत्य मान रहे हैं । कैसे क्षणिक और असत्य वो बताता हूँ ध्यान दीजिए, मान लीजिए आपका कार्यालय आपके घर से 30 किलो मीटर पर है आप बस से जाते हैं तो आपको बैठे बैठे ऊबन होती है, भीड़ में आप असहज महसूस करते हैं तो आप सोचते हैं कि अपनी सवारी होनी चाहिए और आप खरीद लेते हैं, एक परेशानी को हटाने के लिए आपने कई परेशानियों को खरीदा ये आपने ध्यान नहीं दिया, देखिये नई गाड़ी आई तो उसको रखने का चक्कर, उसमें ईंधन का चक्कर, उसके सर्विसिंग का चक्कर, इन्सुरेंस का चक्कर, अगर रास्ते में खराब हुई तो आप से अच्छा कौन सोच सकता हैं, अपने जान से ज्यादा उसको संभाल के रखने का चक्कर, रात को कुछ आवाज हुई तो पत्नी और बच्चा को संभालने से पहले गाड़ी को देखना ये सब क्या है? आप इसपर एक बार सोचिये जरूर, हो सकता है मेरी बातें आपको फालतू का बकवास लगे लेकिन एक बार सोचिये।

अब आते हैं मुद्दे पे आते हैं, रिवाज़ों से मन हटने का कारण है उसका भारी और मुश्किल होना, आज सभी क्षेत्र में समय के साथ परिवर्तन हो रहा है परंतु अपने रिवाजों में कुछ अलग ही बदलाव हुआ है और ये बदलाव लोगो को उदासीनता एवं सक के तरफ ले जाता है, जैसे आज आप एक सत्यनारायण भगवान का कथा करवाते हैं तो पंडित जी समान के सूची में ऐसे ऐसे समान लिखेंगे जो दिखावा का होगा, लोगो को इतना कड़ा नियम बताया जाएगा कि आज के समय में मुश्किल है जैसे "जबतक पूजा ना हो जाये घर के लोग बिना पानी या चाय के रहेंगे, घर में सभी सदयस्य नए कपड़े पहनेंगे, फलाना मिठाई और फलाना फल होना ही चाहिए उसके बिना पूजा शुद्ध नहीं होगा यानी दुनिया भर का खर्चा और नियम जिसकी कोई आवस्यकता ही नहीं है, और इतना नियमों का हवाला देके डरा दिया जाता कि जिसका मन होता भी है वो भी पीछे हट जायेगा। आखिर ऐसा होता किसलिए है? ऐसा इसलिए होता है कि लोगों में ज्ञान की कमी है, आज लोग अपने परिवार और खानदान के पारंपरिक रिवाज को बहुत सही से नहीं जानते वो पूरी तरह से पंडित के ऊपर आश्रित हो जाते हैं और आजकल पंडित जी भी इतने ज्ञानी की इसका रिवाज उसमे उसका रिवाज इसमे डाल देते । दूसरा यजमान अपना सुविधा के अनुसार कुछ पूछे पंडित जी से तो पंडित जी उसमे हाँ में हाँ मिला दे ये सोच के की कहीं यजमान नाराज़ न हो जाये। ये भगवान को कम यजमान को ज्यादा खुश करने वाला रिवाज़ हो गया इसका परिणाम ये हुआ कि आज यजमान पंडितों को बताने लगे हैं यानी घुमाने लगे अपने इशारे पे। अब एक ये भी पहलू है इसका कारण, आज लोग पार्टी पे और ऐस मौज पे लाखों खर्च कर देंगे लेकिन सही जगह पैसे देना उनको फालतू खर्च लगता है जैसे कोई अपने खाना का आर्डर करता है और खाना उसके घर पे आता है तो वो उस खाना लेन वाले को खाना के कीमत के अलावा पैसे दे देंगे, क्यो? उनसे पूछो तो कहेंगे बिचारे ने मेहनत की मेरे घर पे आया। भाई उसको इसी पहुँचाने और लाने के तो पैसे तनख्वाह के रूप में मिलते हैं यहाँ ये फालतू खर्च नहीं है? Sir शब्द सुनने और अपना दिखावा के लिए ये सही है लेकिन एक पंडित तुम्हारे घर आता है गला फाड़ फाड़ के मंत्र, आरती आदि पढ़ता है उसको सही से दक्षिणा दोगे तो वो फालतू है? अगर पंडित को तुम सही से खुश करोगे तो वो भी तुम्हारा नाम सब जगह लेगा और तुमको सबसे अच्छा कहेगा, वो दूसरे यजमान को भी तुम्हारा उदाहरण देगा।

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अब जब हर क्षेत्र में बदलाव हो रहा है तो पंडित जी लोग भी बदलाव कर दिये और उनका बदलाव इतना बढ़ गया कि लोगों को भारी लगने लगा। आज एक छोटे से पूजा में भी दिखावा और चमक दमक की कमी नहीं रहति, आरती और स्त्रोत्र को अपने मूल रूप से उसके मूल उच्चारण से हटा दिया गया जिस कारण ये कर्म फलित नहीं होता तो लोगों का विश्वास टूट जाता है। आज अक्सर लोग मिल जाते हैं जो कहते हैं कि ईश्वर दिल मे, मन में हैं इस दिखावे की जरूरत नहीं, बिल्कुल सही लेकिन अरे मूर्ख मनुष्य, कर्म के बिना फल नहीं मिलता ये तुझे नहीं मालूम? नहीं मालूम तो सुन तुम अपने घर में ही किसी बच्चे को कोई खाने की वस्तु दिलाते हो तो क्या करते हो? उस बच्चे से मांगते हो या कहते हो कि फलाने को दे दो थोड़ा, अगर वह दे देता है तो क्या कहते हो ये बहुत अच्छा बच्चा है, और अगर न दे तो कहते हो कि ये बहुत स्वार्थी होगा या ये बच्चा किसी का नहीं है। अगर बच्चा दे देता है तो क्या करते हो आप उस बच्चे को वापिस कर देते हो यही बात यहाँ भी है जो हमें देता है हम उसको क्या दे सकते है? वो तो हमारी बस परीक्षा लेता है बस। अब दूसरी बात सुनो आप एक लैटर लिख लेते हो या कोई भी काम कर लेते हो तो उसको मंजिल तक भी तो पहुचना होता है कि नही? या मन मे विचार के छोड़ देते हो? यही बात यहाँ भी होता है जब फ़ोन पे या चिठ्ठी के द्वारा काम हो सकता है तो किसी के साथ मुलाकात क्यों करते हो? विश्वास जगाने के लिए ना और काम को सही से समझने के लिए बस यही बात यहाँ भी है।

एक कहानी कहता हूँ मैने कहीं पढ़ी थी सो बता रहा हूँ।

हरियाणा में एक जाट था वो मध्यम तबका का किसान था। उसकी रोजी रोटी सही से चल रही थी। एक दिन उसके गांव में बद्रीनाथ के पंडा जी आये, वो पंडा जी सुबह उठे और अपना नित्य क्रिया से निवृत हो के पूजा करने के लिए बैठे, पूजा करने के लिए वो अपने थैली में से पत्थर रूपी शालिग्राम भगवान को निकाला और उसको नहला के भोग लगा के पूजा करने के बाद वापस थैली में रख दिया, वो जाट ये सब देख रहा था और वो पंडा जी के पास आ के उनसे पूछा कि, गुरूजी ये आप क्या कर रहे थे? पंडा जी ने कहा मैं अपने भगवान की पूजा कर रहा था। उस जाट ने पांडा जी से कहा गुरु जी मुझे भी एक भगवान जी दो मैं भी उनकी पूजा करूँगा, पंडा जी उस जाट को समझाने की बहुत कोशिश की परंतु वो जाट नहीं माना, अंत मे पांडा जी परेशान हो के अपने थैली से एक पत्थर निकाल के दे दिया और कहा कि ये तुम्हारे गोपाल जी हैं इनको अपने से पहले नहलाना, अपने से पहले खिलाना। वो जाट उस पत्थर रूपी गोपाल जी को ले के चला गया और जैसा पंडा जी ने कहा था वैसा ही करने लगा। उसको काम करते हुए गोपाल जी पे ध्यान नहीं रहा साम को याद आया तो वो जैसा पंडा जी ने कहा था वैसा ही किया और खाने को दो मक्के की रोटी बनाई एक अपने लिए और एक गोपाल जी के लिए। वो दूसरे मक्के की रोटी और सब्जी ले के उस पत्थर रूपी गोपाल जी के पास गया और बैठ के उनके सामने खाना रखने के बाद बोला, लो गोपाल जी खाना खाओ गुरूजी ने कहा था पहले आपको खिलाऊँ फिर मैं सो आप जल्दी खाओ फिर मैं खाऊंगा मुझे भूख लगी है। उस पत्थर में से भगवान कैसे आते और उसके इस काम को कोई पागलपन ही कहेगा लेकिन हुआ क्या देखिये। वो काफी देर तक बैठा रहा और काफी बार प्रयास कर चुका बोल बोल के लेकिन गोपाल जी नहीं खाये अब वो भी भूख से व्याकुल हो चुका था सो उसने कहा, गोपाल जी तुम खाना नहीं खा रहे अब मैं तुम्हारी पिटाई करूँगा, और वो एक डंडा ले के आ गया इसके बाद भी उसने कई बार कहा कि गोपाल जी खा लो जब गोपाल जी नहीं खाये तब उसने डंडा मारने के लिए उठाया और तभी सच में भगवान प्रकट हुए और उसको रोके फिर भगवान उसके साथ खाना खाये और उससे पूछे बताओ तुम्हे क्या चाहिये । वो जाट मूर्ख बुद्धि था उसने भगवान से कहा मुझे आपके जैसा नौकर चाहिए। इसपर भगवान बोले कि मेरे जैसा तो मैं ही हो सकता हूँ सो आज से मैं तुम्हारा नौकर हुआ और रहने लगे उसके साथ और उसका काम में हाथ बटाने लगे। एक साल बाद वो पंडा जी फिर आये, वो जाट दौड़ के उस पंडा जी के पैरों पे गिर पड़ा और सारी कहानी बात दिया।

पंडा जी को उसके बातों पे विश्वास नहीं हुआ जब उस जाट ने जोर दे करके कहा तो पांडा जी बोले कि मुझे भी मिलवाओ तो उस जाट ने हाँ कर दिया और अपने साथ खेतों पर ले गया खेत पे गोपाल जी पानी डाल रहे थे, उस जाट ने पंडा जी से कहा लो गुरुजी मिल लो गोपाल जी से वो पांडा जी बोले किससे मिलूं यहाँ तो कोई नहीं है लेकिन वो जाट बोला ये तो रहे पानी डाल रहे हैं, पांडा जी को कुछ गड़बड़ लगा उसने उस जाट से बोला कि ठीक है तो गोपाल जी से बोलो की मुझे भी दिखाई दे, और जाट ने ऐसा ही किया लेकिन भगवान फिर भी न दिखे उसे, उस पंडा जी ने उस जाट से कहा कि तुम अपने गोपाल जी से पूछो की वो मुझे क्यों नहीं दिख रहे, इस पर उस जाट ने प्रभु से पूछा कि हे गोपाल जी आप मेरे गुरु जी को क्यों नहीं दिख रहे ? इस पर भगवान ने उस जाट से कहा कि तुम्हारा गुरुजी विद्वान है इसलिये उसे नहीं दिख सकता। इस बात पे उस जाट को आश्चर्य हुआ और उसने भगवान से फिर पूछा कि विद्वान हैं तो ओर अच्छी बात है, इसमें गलत क्या है? या पाप कहाँ है? जो वो आपको नहीं देख सकते? इसपर भगवान ने उस जाट से कहा कि गलत कुछ नहीं है, विद्वान होना अच्छी बात है, इसमे कोई पाप नहीं है परन्तु एक कमी होती है इन विद्वानों में और वो है विश्वास की कमी ये हर बात में क्यों, क्या, कब, कैसे करते हैं तो जिसके पास विश्वास की कमी हो हम उसे नहीं दिखते क्योंकि वो अपने मन से अविश्वास का पर्दा नहीं हटा पाता, सच्चाई सामने होने पर थोड़ी देर के लिए हाँ तो कर देता है परंतु बाद में फिर से प्रश्नों के बीच घिर जाता है।

वैसे भी आप देखिए कि हर कोई या बड़े बुजुर्ग कहते हैं कि किसी काम को करने के लिए खुद पे विश्वास होना चाहिए, जैसे किसी बीमार का इलाज करवाने में भी चिकित्सक और दवाई पे विश्वास होना चाहिए और यही बात इस जगह भी लागू होता है।

मैं अपने अगले ब्लॉग में बताऊंगा की विश्वास से और ईश्वर कैसे हमारी सहायता करते हैं? हम ईश्वर के द्वारा दिये गए अच्छे या बुरे परिणाम को कैसे अपनी योग्यता मान लेते हैं? कैसे हम अपने सामने खड़े ईश्वर को नहीं पहचान पाते?

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