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ईश्वर किसे और कैसे प्राप्त होते हैं? ईश्वर क्या है?

ईश्वर का अर्थ लोग परमात्मा से भी लगाते हैं और भगवान से भी । मेरे कहने का अर्थ है कि ईश्वर में वे सभी आ जाते हैं जिन्हें हम पूजते हैं या महत्वपूर्ण मानते हैं जो हमारी जिंदगी को किसी न किसी रूप से प्रभावित करते हैं । ठीक वैसे ही जैसे डॉक्टर शब्द कहने से पुरुष, स्त्री, सहायक सभी प्रकार के चिकित्सक आ जाते हैं, phd की उपाधि वाले भी आ जाते हैं।

अब हम इन्हीं के विषय में बताने जा रहे है, इसमे मैं आपको ईश्वर के विभिन्न प्रकार, भगवान का अर्थ, त्रिदेव और शक्ति का रहस्य एवं सृष्टि कैसे हुआ? बताऊंगा।

जैसा कि मैंने आपसे अपने पिछले ब्लॉग में कहा था कि परमात्मा एक प्रकाश पुंज है और उसमें लगातार क्रियाएं होती रहती है इस बात को ध्यान में रख के आप आगे पढीये और समझने का प्रयत्न कीजिये। इस प्रकाश पुंज में लगातार अभिक्रिया होने से तीन गुण अलग हुए 1- सत्व गुण, 2- रजो गुण और 3- तमो गुण। आप सभी जानते हैं कि किसी भी चीज में लगातार क्रिया होने से कुछ ना कुछ परिणाम जरूर होगा, जैसे दूध को लगातार मथने से  मक्खन बनेगा , ठीक ऐसा ही होता है यहाँ पर।

Soul 1- सत्व गुण = इस गुण को ही ब्रह्मा कहा जाता है सत्व का अर्थ सात्विकता होता है मतलब आज के युग मे जिसे लोग अच्छाई या भलाई कहते हैं। इस गुण का काम है किसी चीज का निर्माण करना, किसी को मार्ग दिखाना। जैसे कोई भला इंसान क्या करता है? तो वो किसी को सही मार्ग दिखता है, किसी के दुख को दूर करने के लिए वह प्रयत्न करता है, और वह इसी प्रयत्न में एक दूसरे स्थिति या कार्य या चीज का निर्माता बन जाता है, जैसे कोई इंसान बहुत भूखा है 4 दिनों से उसने कुछ नहीं खाया तो वहाँ कोई भला इंसान उसको खाना खिला देता है और उसके भलाई के लिए किसी NGO को सूचना देता है अर्थात वह भला इंसान यहाँ पर उस भूखे इंसान के लिए खाना उपलब्ध कराने के लिए एक स्थिति उत्पन्न करता है और NGO को सूचित कर उस व्यक्ति का जीवन सुधरता है यानी उसके लिए सही रास्ता बनाता है। यह काम उस भले आदमी के अंदर मौजूद सत्व गुण के कारण होता है। यह एक इंसान में निहित उस थोड़ी सी गुण का प्रभाव है तो परमात्मा में यह गुण जो हमारी कल्पना से परे है वो कितना कर सकता है जरा सोचिए।


Soul 2- रजो गुण= रजो गुण को ही विष्णु कहा जाता है। रजो गुण के कारण मनुष्य भोग(भोग से यहाँ गलत न लें, भोग मतलब उपभोग है) करता है और पालन करता है। कोई इंसान जन्म लेता है सत्व गुण के कारण और वह अपनी इक्षा के अनुसार जिंदगी जीति है यानी अपने आप को पालता है रजो गुण के कारण। यहाँ थोड़ा आपको अटपटा लगा होगा क्योंकि पालन का मतलब साधारणतया अपने परिवार को पालने से ही लेते हैं, लेकिन सोचिये तो आपको दिखेगा की मनुष्य परिवार को बाद में पहले खुद को पालता है जैसे बचपन में उसे कौन से परिवार का पालन करना होता है लेकिन वह भोजन, कपड़ा और श्रृंगार अपने अनुसार और पसंद से करता है किसको पालने के लिए तो अपने आप की अपने शरीर को। इन सब के बाद वह बड़ा होता है और आय करता है तब अपने परिवार को पालता है। जब थोड़ा सा यह गुण मनुष्य से इतना कुछ करवाता है तो परब्रह्म में स्थित यह गुण क्या कर सकता है? आप इसकी थोड़ी कल्पना कर सकते हैं।

Soul 3- तमोगुण = तमोगुण अर्थात तामसिक गुण इस गुण के कारण विनाश होता है और इस गुण को ही शिव कहते हैं। कोई भी मनुष्य अपने या दूसरे का अहित इसी गुण की वजह से करता है । जैसे कोई मनुष्य किसी को हानि पहुँचाने की सोचता है क्योंकि उसके अंदर क्रोध होता है और क्रोध आता है इसी गुण के कारण वह दूसरे को नुकसान के साथ साथ खुद का भी नुकसान करता है जो वह समझ नहीं पता। जैसे कोई मनुष्य किसी दूसरे मनुष्य से किसी कारण वस नाराज हो जाता है और वह उसे सबक सिखाने की बात सोचता है तो वह उसे सबक सिखाने के लिए अपना शारिरिक बल, अपना रक्त, दूसरे मनुष्य का मानसिक स्थिति, उसके शारिरिक बल, अपना और उसका वित्तीय स्थिति और सबसे महत्वपूर्ण समय का नाश करता है। शिव विनाश करते हैं, इसका ये नहीं मतलब होता है की किसी को खत्म कर देना, विनाश का अर्थ किसी भी वस्तु का नाश "चाहे वो दृष्य हो या अदृश्य हो" होता है।

हर एक मनुष्य के अंदर आत्मा है जो परमेश्वर का अंश है और इस कारण ये तीनो गुण हर मनुष्य में होता है। ये भी एक कारण है जिससे हम कहते हैं कि हर चीज में और हर जगह ईश्वर हैं। इसमें निर्भर ये करता है कि वह मनुष्य अपना रुचि किस चीज में जगाता है और उसका झुकाव किधर है । वह जिस गुण से अपने आप को सन्तुष्ट पायेगा वह वैसा ही बनेगा। ये तीनो गुण कर्म की प्रक्रिया है।

हमारे शास्त्रों में बताया गया है कि जब स्त्रि गर्भवती हो तब उसे कौन से कार्य करने चाहिये, क्या खाना चाहिए और कई नियम, इनका यही कारण है कि जैसा गर्भवती स्त्री उस समय करेगी उसी के अनुरूप संतान होगा। यह भी वैज्ञानिक नज़रिया है। जैसा कि मैंने आपको अपने पिछले ब्लॉग में बताया था कि आज के विज्ञान के अनुसार सभी वस्तुऐं एक दूसरे को अपनी तरफ आकर्षित करता है अपने चुम्बकीय प्रभाव से तो यहाँ भी वही होता है जब बच्चा अपने माता के गर्भ में होता है तब उसका निर्माण होता रहता है और उसकी माता अगर सात्विक विचार, आहार और व्यवहार करेगी तो उस बचे में विद्यमान सत्वगुण अपने सजातीय गुण को अवशोषित करता है और वह बच्चा सात्विक प्रवृत्ति का होता है । यही नियम सभी गुणों के साथ होता है। आप इस बात को अपने आस पास के माहौल में देख सकते हैं।

Soul ईश्वर=भगवान= मैं अब भगवान का शाब्दिक अर्थ बताता हूँ। भगवान में 5 अक्षर हैं, आप यहाँ 4 अक्षर ही देख रहे हैं लेकिन मैं आपको विस्तार से बताता हूँ तब आप कुछ सोचियेगा । ये तो लगभग सभी जानते हैं कि हमारा शरीर 5 तत्वों से बना है भूमि= Earth, जल= पानी= Water, पावक=अग्नि= Fire, गगन= आकाश=Sky, समीर=हवा=Air, और यही ईश्वर है, वेद के अनुसार हिन्दू धर्म में उन्ही चीजों की पूजा की जाती है जिसका हमारे जीवन पे प्रभाव पड़ता है या हमे अपना जीवन जीने में सहायक है जैसे गाय आज के विज्ञान ने भी यह माना है कि गाय का मूत्र, मल, दूध लाभदायक है और इससे हमारे अंदर के बीमारी ठीक होता है, गाय के शरीर पे हाथ फेरने से भी रक्तचाप में फायदा मिलता है इन सब के बाद गाय ऐसा प्राणी है जो ऑक्सीजन लेता है तो ऑक्सीजन छोड़ती भी है, दूसरा पीपल का पेड़ , आज के विज्ञान के अनुसार ही पीपल ऐसा पेड़ है जो 24 घंटे ऑक्सीजन देता है इसके अलावे और भी बहुत कुछ।

ठीक इसी प्रकार भगवान उसको कहा गया है जो हमारी रचना में सहायक है जैसे

भगवान=

भ= भूमि= Earth

ग= गगन= Sky

वा= वायु=Air

न= नीर= जल= Water

अ=अग्नि=Fire

आप सोचते होंगे कि अ तो है नहीं तो ये कहाँ से आया तो ये व्याकरण की बात है हर अक्षर में अ छिपा होता है ये आप सभी जानते हैं सो अ भी है इस शब्द में।

तो ईश्वर इन्हें ही अर्थात अपने आस पास के वातावरण को कहते है ओर इसे ही प्रकृति भी कहते हैं।

ईश्वर को प्राप्त करने के लिए लोग अनेकों उपाय करते है।

Soul वो किस ईश्वर को ढूंढ रहे हैं जबकि ईश्वर यहाँ आपके अंदर ही हैं अर्थात आप ईश्वर और परमेश्वर के ही अंश हो जैसे कि पहले मैंने बताया । तो फिर ये राम, कृष्ण, ईशा मसीह ये कौन हैं ? इन सभी का जन्म हमारे आपके जैसे ही हुआ है लेकिन ये अपने अंदर के ईश्वरत्व को पहचाना और अपना ज्ञान और कृपा सब को प्रदान किया। ये ईश्वरत्व पहचानना आप भी जान सकते हैं और कर

सकते हैं परंतु हम इस रहस्य से काफी दूर हैं । इश्वरत्व लेन के लिए हमे अपने अंदर सात्विकता का संकलन करना होगा क्योंकि जैसा मैंने पहले कहा है सात्विकता ही निर्माण करती है।

अब ये सात्विकता आएगी कैसे तो हमें इसके लिए तप और योग का सहारा लेना होगा योग के द्वारा हम अपने सभी चक्रों को गतिशील करके इस चीज को पा सकते हैं और तप के द्वारा हम अपने शरीर के सभी तत्वों को जागृत कर सकते है और ईश्वर को पा सकते हैं।

जैसा कि मैंने पहले भी कहा है कि सभी वस्तु एक दूसरे को अपनी तरफ खिंचती है तो यह नियम यहां भी लागू होता है।

जब हमारे सभी चक्र जागृत हो जाते हैं तब ये हमारे शरीर से ब्रह्मांड की उर्जाओं को हमारे अंदर खिंचती है , लेकिन यहाँ हमे सावधान रहने की जरूरत होती है और एक सही मार्गदर्शक की आवस्यकता होती है नहीं तो हम शुभ के जगह अशुभ भी अवशोषित कर सकते हैं ।

इन चक्रों और तपस्याओं से संबंधित जानकारी हम अपने अगले ब्लॉग में बताएंगे आपको। मेरे द्वारा लिखा गया सभी ब्लॉग एक दूसरे से जुड़े हुए हैं, अतः आप सब से निवेदन है कि मेरा कोई भी ब्लॉग पढ़ते वक्त या उसपर विचार करते वक्त सभी ब्लॉग का अवलोकन करें


आप अपने मन मे उठ रहे किसी भी प्रश्न को हमसे साझा कर सकते हैं हम आपके प्रश्नों का उत्तर ईमेल के माध्यम से भेज देंगे तथा उसे अपने इस ब्लॉग पे प्रकाशित करेंगे। हमारा ईमेल- tatwabodhini@gmail. com,
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