TatwaBodhani ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते | पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवा वशिष्यते ||

आत्मा और परमात्मा क्या है? ये मोक्ष क्या है? ये जन्म मरण का क्या रहस्य है?

आइये आज हम बात करते हैं कुछ गुढ़ रहस्यों पर, आत्मा ये आत्मा क्या है?
लोग अक्सर कहते हैं कि आत्मा से ही परमात्मा बनते हैं ।
Soul तो आत्मा को समझने के लिए हम इस ब्रह्मांड की कुछ रहस्यों को पहले जानते हैं। ब्रम्हा ने बनाया एक अंड जो कहलाया ब्रह्मांड । ब्रह्म+अंड=ब्रह्मांड।
हिन्दू धर्म के आदि शंकराचार्य जी कहते हैं कि भगवान विष्णु क्षीरसागर में वास करते हैं तो ये क्षीर सागर है कहाँ? जबकि पृथ्वी पर सात महासागर ही हैं लेकिन इसमें से क्षीरसागर तो कोई नहीं है। पहले ये समझना जरूरी है कि क्षीरसागर का अर्थ क्या है? तो क्षीरसागर का अर्थ होता है दूध का समुद्र, क्षीर= दूध, सागर= समुद्र ।
मैं आपको बताना चाहता हूँ कि लोग बहुत सी चीजों को कोई उपमा दे देते हैं जैसे किसी सुन्दर मनुष्य को चाँद की संज्ञा दे देते हैं इत्यादि। ठीक इसी तरह क्षीरसागर भी उपमा है । किसकी उपमा है तो प्रकाश पुंज का, एक दूध के जैसा उजला प्रकाश पुंज जिसके एक कोने में मटर के दाने के बराबर हमारा ब्रह्मांड है । और इस ब्रह्मांड में सरसों के दाने के बराबर हमारा आकाश गंगा है। तो इसी प्रकाश पुंज का एक छोटा सा कण आत्मा है और यह एक्टिव
रहता है ठीक वैसे ही जैसे इलेक्ट्रान रहती है आत्मा इलेक्ट्रान से भी ज्यादा तीब्र होता है और अभिक्रिया करता है।
अब आपके मन में ये हो रहा होगा कि जब क्षीरसागर एक प्रकाश पुंज है तो फिर हमें अंतरिक्ष मे अंधेरा क्यों मिलता है? अंधेरा मिलने का कारण है लाइट, जी हाँ, आप एक प्रयोग कीजिये लाइट या सूर्य पर आप देखिए थोड़ा और फिर हटा लीजिये, क्या दिखा? अंधेरा दिख ना! यही नियम यहाँ भी लागू होता है ये आपको थोड़ा अटपटा लगा होगा लेकिन हकीकत यही है, रेफ्रिजरेटर में कोई भी
वस्तु ठंडी कैसे होती है? जिन्होंने ये जाना होगा उनके समझ मे ये बातें आ गई होंगी, वैसे आप इसे गणित के अनुसार भी समझ सकते हैं जैसे + को + से जोड़ने पे क्या होता है? -,- क्या होता है? इनको समझ गए तो मेरी ये बातें आप आसानी से समझ जाएंगे।
Soul आत्मा क्षीरसागर का एक छोटा सा कण है जो गतिमान रहता है या अतिशिघ्र अभिक्रिया करता है।
मैं अपने अगले ब्लॉग में बताऊंगा की ये छोटा सा कण हमारे शरीर को कैसे चलाती है?
परमात्मा - आत्माओं के समूह को परमात्मा कहते हैं जैसे जल के समूह को समुद्र । परमात्मा को आप ऐसे भी समझ सकते हैं, परम+आत्मा=परमात्मा।
आप थोड़ा सोचिये की एक छोटा सा कण जिसकी हम कल्पना मात्र कर सकते हैं वो इतना ताकतवर है कि किसी भी वस्तु को चला सकती है तो इन आत्माओं का समूह यानी परमात्मा कैसे नहीं इस सृश्टि को चला सकता है? जबकि हम सभी जानते
हैं कि हर वस्तु में अभिक्रिया और प्रतिक्रिया होती है चाहे वो किसी भी अवस्था में हो क्योंकि हर वस्तु के परमाणु कण में इलेक्ट्रान गतिशिल रहता है।
ठीक इसी तरह उस प्रकाश पुंज में भी क्रिया होती रहती है।
एक शास्त्र से ली गई बात मैं यहाँ कहना चाहूंगा जो आपको अटपटा या गलत लगे लेकिन मुझे ये सही लगा, की कोई वस्तु को तोड़ो तो अणु, अणु को तोड़ो तो परमाणु, परमाणु को तोड़ो तो इलेक्ट्रॉन, प्रोटॉन और न्यूट्रॉन,  इनको तोड़ो तो अग्नि, अग्नि को तोड़ो तो शक्ति, शक्ति को तोड़ो तो चेतना, चेतना को तोड़ो तो मन, मन को तोड़ो तो बुद्धि, बुद्धि को तोड़ो तो प्राण यानी आत्मा होता है।
आज के वैज्ञानिकों ने यहाँ तक जाना कि परमाणु और इलेक्ट्रान काफी शक्तिशाली हैं, आप सोचिये की जब ये कण इतने शक्तिशाली हैं और अग्नि एवं शक्ति का प्रभाव हम जानते ही हैं तो एक क्षण के लिए कल्पना कीजिये कि आत्मा कितनी शक्तिशाली होगी तो आपके मन में उठ रहे एक सवाल का जवाब यही
है कि ये छोटा सा कण हमारे शरीर को कैसे चलाती है हम बता दें कि जितनी सूक्ष्म उतनी ज्यादा शक्तिशाली ।
अब आपको मोक्ष का अर्थ भी आसानी से समझ मे आ जायेगा और मेरे पिछले ब्लॉग जो भूत से संबंधित था, में जो विस्मय आपको होगी उसका भी जवाब मिल जाएगा ।

तो आइए जानते हैं मोक्ष क्या है?
आत्मा को परमात्मा में मिल जाना ही मोक्ष कहलाता है।
जैसा कि मैंने आपको पहले कहा कि दूधिया प्रकाश का एक छोटा सा कण ही आत्मा
है और इन आत्माओं का विशाल और अनंत समूह ही परमात्मा है।
जैसा कि कई जगह शास्त्रों में कहा गया है कि आत्मा अनंत सफर पर होती है।
आप रामानन्द सागर द्वारा बनाया गया रामायण ही देख लीजिए उसमे कई जगह राम जी से मिलने के बाद ऋषि मुनि अपना शरीर का त्याग करते हैं और वहाँ इस शब्द का प्रयोग किया गया है कि ये अपने अनंत सफर पर चले गए। कहने का मतलब है कि आत्मा हमेशा गतिमान रहती है। चुकी आत्मा परमात्मा का ही एक छोटा सा कण है इसीलिए शास्त्रों में कहा गया है कि ईश्वर सब में है और आत्म ज्ञान जिसको हो जाता है वो मोक्ष पा लेता है। जैसे आपने सुना होगा कि भगवान बुद्ध को आत्म ज्ञान हुआ था। इस आत्मज्ञान का ये मतलब नहीं कि आप परमात्मा के अंश हैं आत्मज्ञान का मतलब अपने अस्तित्व से कर्म तक का पूर्ण ज्ञान।

Soul तो यह अनंत पथ क्या है?

ये अनंत पथ अपनी क्रिया में बने रहना है। मतलब की
मेरे द्वारा पहले कहे गए बातों से यह ब्रह्मांड क्षीरसागर में एक मटर के
दाने के समान है यानी कि हम परमात्मा में ही हैं यानी आत्मा भी परमात्मा में ही है और आत्मा एक बहुत ही गतिशील है तो अनंत पथ का मतलब यही है कि आत्मा किसी शरीर से निकलने के बाद अपने क्रिया करते हुए विचरण करता रहता है।
अब एक प्रश्न ये भी उठता है कि जब आत्मा शरीर से निकल के अनंत पथ पर चलता ही है तो ये मोक्ष क्या है?
बिल्कुल सही सोचा आपने, जन्म और मरण के चक्र से जो मुक्त हो गया वही मुक्ति है और अनंत पथ पर चलने का मतलब ही है मुक्ति मिलना, लेकिन सबको मुक्ति नहीं मिलती। मुक्ति लाखों में किसी एक को मिलती है।

ये मुक्ति सबको मिलती क्यों नहीं?

तो इसका आधा जवाब मैन अपने पिछले ब्लॉग
भूत क्या है? में दे दिया था और यहाँ पूरा समझाने की कोशिश करता हूँ । जैसा कि मैंने पिछले ब्लॉग में कहा था कि आप सभी को मालूम है कि ब्रह्मांड की हर वस्तु एक दूसरे को अपनी तरफ आकार्षित करती है तो बस यही कारण है मतलब जैसा मैंने पिछले ब्लॉग में कहा कि आत्मा को जो वस्तु अपनी तरफ आकर्षित करेगा वो उसके मोह में फंस जाएगा और वो मुक्त नहीं हो पायेगा।
अब सवाल ये भी उठता है कि जब यह कण इतना शक्तिशाली है फिर इसको कौन सा पदार्थ आकर्षित कर सकता है ?
एक बात हम सभी जानते हैं कि हर वस्तु के निर्माण में किसी एक तत्त्व का ही हाथ है, और वो तत्व गॉड पार्टिकल ही तो है । इसे हम एक छोटा सा उदाहरण से समझते हैं कि कोई वस्तु हमें कैसे आकर्षित करती है।
माना कि किसी व्यक्ति को अपने घोड़े से लगाव हो गया है, और हर जीव या वस्तु में गॉड पार्टिकल है तो वो गॉड पार्टिकल ही एक दूसरे को अपनी ओर आकर्षित करता है और हम सभी जानते हैं कि वातावरण, स्थान और समय का प्रभाव सभी चीजों पर पड़ता है तो इस नियम से जो गॉड पार्टिकल शरीर और स्थिति के
अनुसार मजबूत और कमजोर होता है वो एक दूसरे को अपनी ओर आकर्षित कर लेता है।
अब मैं आपको इस शरीर में आत्मा के कैद होने का राज बताता हूँ, आत्मा तीन चीज से बंधा होता है, 1- चेतना, 2- मन, 3- बुद्धि, इन तीनो के बीच में आत्मा होता है और इनमें से किसी एक के टूटने पर आत्मा मुक्त हो जाती है मतलब मोक्ष मिल जाता है। अब यहाँ पर आप थोड़े सोच में जरूर होंगे।
अब मैं आपको विस्तार से बताता हूँ। आत्मा मुक्त दो तरह से होती है,

1- मृत्यु जिसे लोग जानते हैं,

2- मोक्ष जिसे बहुत कम लोग जानते हैं।

Soul मृत्यु में लोग या आत्मा शरीर से मुक्त होती है और समय एवं काल के अनुसार पुनः किसी भी रूप में या तो जन्म लेते हैं या भटकते रहते हैं। ऐसा क्यों होता है? तो ऐसा इसलिए होता है कि आत्मा जिन बंधनों के बीच बांधा होता है उससे वो मुक्त नहीं हो पाता है जिस कारण उसका भार ज़्यादा होता है और वह एक निश्चित ऊंचाई से ऊपर नहीं जा पाता । यहाँ वैज्ञानिक सोच रखिये जैसे एक वैलून अकेला हवा में 5 किलो मीटर ऊपर जा सकता है परन्तु उसमें एक 50 ग्राम का सामान बांध देने पर वह सिर्फ 3 किलो मीटर ही जा सकता है, यही यहाँ आत्मा के साथ भी है, एक ओर नियम यहाँ काम करता है जैसे आप सभी जानते हैं कि कोई वस्तु अपने जाती के साथ तुरंत प्रतिक्रिया करता है और ये नियम
लागू होता है आत्मा का किसी वस्तु से माया, मोह, लगाव। अब आत्मा जब शरीर से निकलती है तो वह पहले से ही चेतना, मन और बुद्धि के भार से भारी है और जिस वस्तु से उसको लगाव है उसका  भी भार जुड़ जाता है और उसका भार बढ़
जाता है जिस कारण वह ज्यादा ऊँचाई अर्थात अपने अनंत सफर पर नहीं जा पाता और अपने आप को मुक्त नहीं कर पाता।
Soul जिस आत्मा को किसी चीज से लगाव यानी मोह नहीं होता उसको सिर्फ अपने तीन बंधन काटने होते हैं, इन तीन बंधन में से एक भी बंधन के टूटने पर बांकी के बचे दो बंधन कमजोर हो जाते हैं और आत्मा उसे आसानी से तोड़ के मुक्त हो जाती है। जैसे आपने जरूर सुना होगा कि महात्मा बुद्ध, भगवान महावीर ने समाधी ली या निर्वाण प्राप्त की तो ये समाधि या निर्वाण क्या है?
समाधि या निर्वाण में लोग अपने मन और बुद्धि को नियंत्रित करके चेतना को रोक देते हैं मतलब चेतना को तोड़ते हैं और चेतना के टुटते ही आत्मा बांकी के दोनों बुद्धि और मन के बंधन को भी तोड़ के मुक्त हो जाता है अर्थात अपने अनन्त पथ पर चला जाता है । क्योंकि तब आत्मा में कोई भार नहीं होता वह हल्का होता है और इस अनन्त विचरण के कारण आत्मा को जन्म मरण के चक्र
से मुक्ति मिल जाती है । वह सीधा परमेश्वर में विलीन हो जाता है।इस उदाहरण से आपको सब बात समझ में आ जाएगी जैसे हवा का स्थान वायुमंडल है और आप एक रिक्त ड्रॉपर को समुद्र के अतल गहराई में लेजाकर ड्रॉपर के अंदर का एक बून्द हवा ड्रॉपर से बाहर निकाल दीजिए वह हवा उसका जहां स्थान है यानि
वायुमंडल में मिलकर ही रुकेगा जैसे हवा का एक बून्द आजाद होने के बाद ऊपर की तरफ गतिशील रहता है उसी तरह आत्मा भी आजाद होने के बाद ऊपर की तरफ गतिशील रहता है और तब तक गतिशील रहता है जब तक की परमात्मा में नहीं मिल
जाता । फिर उस आत्मा का जन्म नहीं होता वह जन्म मृत्यु के चक्कर से छूट जाता है  ।

आपको मैं अपने अगले ब्लॉग में बताऊंगा की मन और बुद्धि को कैसे नियंत्रित करते हैं और यह क्यों जरूरी है?


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